साधारण परिवार की असाधारण बेटी हैं चित्रा त्रिपाठी

“कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता.. एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…” कवि दुष्यंत कुमार की ये कविता पूरी तरह चरितार्थ होती दिखायी देती है एक ऐसी मिडल क्लास सीधी-सादी लड़की पर जो अपनी मेहनत के दम पर छोटे पर्दे के खबरों की स्टार बन गयी. जी हां, ये स्टार कोई और नहीं, चित्रा त्रिपाठी हैं जो कुछ ही वर्षों में सफलता के शिखर पर जा पहुंची हैं.

11 मई 1985 को गोरखपुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी चित्रा स्थानीय विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन के बाद पत्रकारिता में कुछ ऊंचा करने की चाहत लिये दिल्ली पहुंची. पत्रकारिता के कोर्स में दाखिले के लिये वे दिल्ली-एनसीआर के तमाम कॉलेजों में भटकीं, लेकिन हर जगह ऊंची फीस देख कर मन मसोस कर वापस लौट गयीं. गोरखपुर में ही एमए में एडमिशन लिया और सब्जेक्ट चुना डिफेंस स्टडीज. कुशाग्र बुद्धि चित्रा ने गोल्ड मेडल हासिल किया. 2001 में वे रिपब्लिक डे परेड में गार्ड ऑफ ऑनर कमांड करने के लिये भी गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी थीं. उसी समय वे बतौर एनसीसी कैडेट प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिली थीं। 15 यूपी गर्ल्स बटालियन से एनसीसी में चित्रा को सी सर्टिफिकेट हासिल है.

बिना किसी विशेष डिग्री-डिप्लोमा के चित्रा ने पत्रकारिता में उतरने की ठानी औऱ स्थानीय केबल न्यूज सत्या चैनल में एंकरिंग करने लगीं. वहां से गोरखपुर दूरदर्शन इसके बाद ईटीवी और न्यूज 24 होते हुए सहारा समय को एंकर कम प्रोड्यूसर ज्वायन किया. सहारा में 2012 में लंदन ओलंपिक जैसा बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट कवर किया. चित्रा का अगला पड़ाव था इंडिया न्यूज जहां उन्होंने ‘बेटियां’ नाम से एक साप्ताहिक शो का संचालन किया. ये शो काफी समर्थ औऱ सार्थक कार्यक्रम था, जिसमें दिखायी गयी एक बेटी को राष्ट्रपति पुरस्कार तक मिला.

सितंबर 2016 में वे एबीपी न्यूज पर चली गयीं. फिर वंहां सफलता के कई झंडे गाड़ने के बाद फरवरी 2019 से सबसे तेज चैनल आजतक पर एक स्टार ऐंकर बन गयी हैं. चित्रा राजनीति और रक्षा की खबरों पर जितनी तेवरदार दिखती हैं, अधिकार औऱ सरोकार के सवालों पर उतनी ही संवेदनशील. ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर बड़े-बड़े न्यूज इवेंट, आउटडोर शोज, स्टूडियो डिबेट और एंकरिंग तक – चित्रा हर मोर्चे पर पूरी तैयारी और दमखम के साथ दिखती हैं. खबरों की दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित सम्मान “रामनाथ गोयनका पुरस्कार” उनकी प्रतिभा का प्रमाण है.2014 में कश्मीर में आई भयानक बाढ के दौरान शानदार रिपोर्टिंग के लिये उन्हें यह पुरस्कार मिला था. आज चित्रा के नाम खबरों की दुनिया के बड़े-छोटे करीब तीस पुरस्कार हैं.

चित्रा कहती हैं – सपनों को सच करने के लिये एक लड़की में तीन चीजें बहुत ज़रुरी हैं- साहस, संयम और संघर्ष. पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है बेटी होना और सपनों को सच करना – एक बेटे से चार गुना ज्यादा ताकत की मांग करता है.