देश की विदेश नीति का उदार चेहरा : सुषमा स्वराज

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के किसी सियासी दल की पहली महिला प्रवक्ता। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की पहली महिला महासचिव। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मुल्क की पहली पूर्ण महिला विदेश मंत्री। हिंदुस्तान के किसी सूबे में सबसे कम उम्र में मंत्रालय संभालने वाली महिला। देश की पहली महिला नेता, जो असाधारण सांसद के सम्मान से सम्मानित हुईं और जिसे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य भी मिला है। ऐसी तमाम सियासी उपलब्धियों को अपनी आंचल में समेटने वाली नारी शक्ति का नाम है सुषमा स्वराज, जो फिलहाल भारत की विदेश मंत्री हैं। वो विदेशी मामलों में संसदीय स्थायी समिति की अध्यक्ष भी हैं।

मोदी सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए सुषमा स्वराज ने वैसा कर दिखाया है, जो अब तक कल्पना भर ही था। सोशल मीडिया को हथियार बनाकर सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्रालय में नयी जान फूंक दी। किसी के वीजा-पासपोर्ट का मामला हो या फिर कोई सात समंदर पार कहीं फंसा हो। एक ट्वीट पर नयी ज़िंदगी देने के लिए सुषमा स्वराज विख्यात हो गयीं। मानवता का परिचय देते हुए पाकिस्तानियों को भी इलाज कराने के लिए सुषमा स्वराज ने एक ट्वीट पर वीजा मुहैया करवा दिया। कुछ ऐसी ही है सुषमा स्वराज की शख्सियत।

हिंदुस्तान की सियासत में लंबी लकीर खींचने वाली छोटे कद की सुषमा स्वराज का संस्कार ही भगवा रहा है। जिस पार्टी में रहते सुषमा ने सफलता की असीमित ऊंचाई तक की दूरी तय की, उसका विचार उनके खून में है । दरअसल सुषमा स्वराज के पिता हरदेव शर्मा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख सदस्य थे। हरियाणा के अंबाला छावनी के रहने वाले हरदेव शर्मा के घर में 14 फरवरी 1952 को एक बच्ची का जन्म हुआ, जिसका नाम पड़ा सुषमा। बेहद ओजस्वी स्वभाव की सुषमा ने एसडी कॉलेज अंबाला से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से कानून की डिग्री हासिल की। कॉलेज के दिनों में ही सुषमा ने छात्र राजनीति की तरफ रुख़ कर लिया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी की सदस्य बन गयीं। लंबे अरसे तक एबीवीपी के साथ जुड़ी रहीं और संगठन का जम कर प्रचार-प्रसार किया। कॉलेज के दिनों में ही सुषमा एक प्रखर वक्ता के तौर पर विख्यात हो चुकी थीं। 1970 में एसडी कॉलेज में सुषमा सर्वश्रेष्ठ छात्रा घोषित किया तो पंजाब विश्वविद्यालय ने 1973 में ही सुषमा को सर्वोच्च वक्ता के सम्मान से सम्मानित किया था।

सुषमा एनसीसी कैडेट भी थीं। तीन साल तक लगातार एसडी कॉलेज छावनी की सर्वश्रेष्ठ एनसीसी कैडेट चुनी गयीं। कॉलेज के दिनों में सुषमा क्लासिकल संगीत, कविता, फाइन आर्ट्स और ड्रामा में भी इंटरेस्ट रखती थीं। इसमें हिस्सा लेने पर उन्हें कई बार अवॉर्ड्स भी मिले।

कानून की डिग्री हासिल करने के बाद 1973 में सुषमा ने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। उन्होंने वकालत शुरू ही की थी कि आज़ादी के बाद के सबसे बड़े जन-आंदोलन ‘संपूर्ण क्रांति’ की शुरुआत हो गयी। जेपी के विचारों से प्रभावित सुषमा भी इस ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा बन गयीं। आपातकाल के विरोध में जमकर प्रचार किया । आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद वो सक्रिय राजनीति में आ गयीं। पार्टी में शामिल होना इसलिए भी आसान था क्योंकि एबीवीपी का काम करते हुए वो कई बार दिल्ली के बड़े नेताओं से मिल चुकी थीं। सुषमा के भाषण से दिल्ली के नेता काफी प्रभावित थे।

इस बीच 1975 में सुप्रीम कोर्ट के वकील स्वराज कौशल के साथ सुषमा की शादी हो गयी। स्वराज कौशल सामाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल के नाम सबसे कम उम्र के राज्यपाल बनने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। वे महज 37 बरस की उम्र में मिजोरम के राज्यपाल बन गये थे। बाद में स्वराज कौशल राज्यसभा के सांसद भी रहे। हालांकि बीजेपी से उनका कोई रिश्ता नहीं रहा।

संपूर्ण क्रांति में शरीक होने वाली सुषमा स्वराज 1977 के विधानसभा चुनाव में मैदान में उतर गयीं। पार्टी ने उन्हें अंबाला छावनी से टिकट दिया। कांग्रेस विरोध में नौजवान सुषमा स्वराज को जबरदस्त जीत मिली। वो विधायक बन गयीं। देवीलाल की सरकार में सुषमा स्वराज को मंत्री भी बना दिया गया। महज 25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने वाली वो देश की पहली महिला थीं। अनुभव की कमी के बावजूद सुषमा ने बेहतरी के प्रयास किये। बेहतर कामकाज की बदौलत 27 बरस की उम्र में ही 1979 में जनता पार्टी ने सुषमा स्वराज को हरियाणा का अध्यक्ष बना दिया था।

1987 में सुषमा फिर से चुनाव जीतकर हरियाणा विधानसभा पहुंचीं। भारतीय जनता पार्टी और लोकदल के गठबंधन सरकार में सुषमा को शिक्षा और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति जैसे अहम मंत्रालयों का जिम्मा दिया गया। यही वो वक्त था जब सुषमा के राजनीतिक करियर ने उड़ान भरी और वो सफलता के शिखर पर आगे बढ़ती चली गयीं।

दरअसल 1990 तक सुषमा हरियाणा सरकार में मंत्री रहीं। फिर वो दिल्ली की तरफ रुख कर गयीं। अब तक बीजेपी की केंद्रीय टीम सुषमा स्वराज के तेवर से वाकिफ हो चुकी थी। आला नेताओं को अंदाज़ा हो गया था कि ये नारी बीजेपी को नयी दिशा में लेकर जायेगी। यही वजह है कि 1990 में पहली बार पार्टी ने सुषमा को राज्यसभा भेजने का फैसला लिया। राज्यसभा सदस्य के तौर पर उन्होंने न सिर्फ आमलोगों से जुड़े मुद्दे उठाये बल्कि तमाम सामाजिक मुद्दों पर कांग्रेस सरकार को घेरती रही। अब पूरा देश सुषमा स्वराज को जानने लगा था।

1996 में पहली बार सुषमा स्वराज को लोकसभा का टिकट मिला। वो दक्षिणी दिल्ली से जीतकर संसद पहुंची। 1996 में जब पहली बार 13 दिनों के लिए बीजेपी की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुषमा स्वराज को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा सौंप दिया। इस दौरान सुषमा स्वराज ने आम जनता के लिए लोकसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू करवाया। हालांकि तुरंत सरकार गिर गयी और सुषमा और कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकीं। 1998 के लोकसभा चुनाव में फिर से सुषमा चुनकर सदन पहुंची। फिर से वाजपेयी जी की सरकार बनी और सुषमा स्वराज को सूचना और प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी का भरोसा ही था कि उन्हें दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया।

इस बीच जब दिल्ली की बीजेपी सरकार में उथल-पुथल शुरू हुई तो पार्टी ने सुषमा स्वराज को फिर से राज्य की राजनीति में भेज दिया। 13 अक्टूबर 1998 को सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री बन गयीं। सुषमा दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने वाली पहली महिला थीं। अगले चुनाव में वो दिल्ली के हौजखास से विधायक चुनी गयीं। हालांकि बीजेपी दिल्ली की सत्ता में नहीं लौट पायी लेकिन सुषमा की सियासी सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

सुषमा स्वराज फिर से केंद्रीय राजनीति में लौट आयीं । 1999 में एक वोट से वाजपेयी की सरकार गिरने के बाद लोकसभा की रणभेरी बजी। पहली बार सोनिया गांधी चुनावी मैदान में उतर रही थीं। लिहाजा उन्हें चुनौती देने के लिए जिस सशक्त महिला कैंडिडेट की तलाश थी, उसकी खोज सुषमा स्वराज पर जाकर खत्म हुई। कर्नाटक की बेल्लारी से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ सुषमा स्वराज मैदान में उतरीं। सुषमा चुनाव तो हार गयीं लेकिन दिल जीत लिया । सुषमा स्वराज बीजेपी की ऐसी पहली महिला नेता हैं जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक के राज्यों में लोकसभा का चुनाव लड़ा है।

साल 2000 में पार्टी ने सुषमा को फिर से राज्यसभा के जरिए संसद में लाने का फैसला लिया। इस बार की वाजपेयी सरकार में भी सुषमा को सूचना प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा दिया गया। सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए सुषमा स्वराज ने कई बड़े फैसले किये। मसलन उन्होंने ही साल 2000 में मीडिया एवं मनोरंजन को उद्योग का दर्जा दिया था। इसका फायदा ये हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री को बैंक से लोन लेने का रास्ता साफ हो गया। हालांकि कुछ दिनों बाद उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय का जिम्मा सौंप दिया गया। स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए सुषमा ने देश के अलग-अलग हिस्सों में 6 नये एम्स की शुरुआत करवायी।

2009 में सुषमा स्वराज मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं। बीजेपी ने पहले सुषमा को लोकसभा में उपनेता बनाया और फिर नेता प्रतिपक्ष बना दिया। सुषमा स्वराज देश की पहली महिला थीं जिन्हें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का ओहदा मिला। लोकसभा में इस पद पर रहते हुए उन्होंने मनमोहन सरकार पर धारदार हमले किये । चाहे घोटाले का जिक्र हुआ या फिर निर्भया कांड, हर मौके पर सुषमा स्वराज ने यूपीए सरकार की पोल खोल कर रख दी। महंगाई का मुद्दा हो या फिर कानून व्यवस्था का, सुषमा संसद से सड़क तक सरकार को घेरती रहीं। अपने बेबाक अंदाज़ की वजह से सुषमा काफी चर्चित हो गयीं।

2014 की लोकसभा चुनाव में सुषमा स्वराज फिर से विदिशा से सांसद चुनी गयीं। केंद्र में जब बीजेपी की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें विदेश मंत्रालय सौंप दिया। सुषमा स्वराज पहली महिला नेता हैं, जिन्हें विदेश मंत्रालय का पूर्ण जिम्मा मिला। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास कुछ दिनों के लिए विदेश मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार रहा था। बड़ी जिम्मेदारी का बड़ा अहसास सुषमा स्वराज को बाखूबी था। लिहाजा वो अपने कर्तव्य पथ पर चुपचाप आगे बढ़ती रहीं। पिछले 4 सालों के दौरान सुषमा की अगुवाई वाले विदेश मंत्रालय ने नया मुकाम हासिल किया।

विदेश मंत्रालय ने पिछले 4 सालों में अलग-अलग देशों में फंसे करीब 90 हजार भारतीयों को बाहर निकाला। सुषमा स्वराज के विदेश मंत्रालय का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन 2015 में चला था। जब यमन के युद्धग्रस्त इलाके से भारत सरकार ने 4700 हिंदुस्तानियों को सुरक्षित वापस लाया । जबकि 2000 विदेशी नागरिकों को भी भारत ने सकुशल बाहर निकाला। फिर सीरिया हो या नेपाल, जहां-जहां भी हिंदुस्तानी जाकर फंसे, वहां-वहां सुषमा स्वराज ने पहल कर उन्हें बाहर निकाला। 100 से ज्यादा ऐसे लोगों को वापस लाया गया जो विदेशी जेल में बंद थे।

पिछले 4 सालों में विदेश मंत्रालय ने देश में 227 नए पासपोर्ट ऑफिस खोला है। जबकि 2014 से पहले देश में सिर्फ 77 पासपोर्ट सेंटर थे। मध्यप्रदेश में तो सिर्फ एक दफ्तर भोपाल में था। अब हिंदी पट्टी राज्यों के साथ-साथ पूर्वोत्तर में भी कई पासपोर्ट दफ्तर खुल चुके हैं। सुषमा स्वराज की दूरदर्शिता का ही असर है कि संयुक्त राष्ट्र के 192 में से 186 देशों में पिछले 4 सालों के दौरान मंत्री-स्तरीय बातचीत हो चुकी है। बाकी 6 देशों से भी बातचीत चल रही है।

सुषमा स्वराज के विदेश मंत्री रहते पिछले 4 सालों में पूंजी और तकनीक के लिहाज से समृद्ध देशों से संबंध बेहतर हुए हैं। फरवरी 2018 तक 14 लाख करोड़ से ज्यादा की पूंजी विदेशों से आ चुकी है। जो स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया जैसी तमाम फ्लैगशिप योजनाओं के लिहाज से आर्थिक मोर्चे पर विदेश नीति की बड़ी सफलता है। भारतीय योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एजेंडा बनाया गया। सुषमा की दूरदर्शी और बारीक विदेश नीति का नतीजा है कि मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम में भारत को सदस्यता मिली। यूपीए सरकार की तुलना में एफडीआई में भी 37.5 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है।

इसके अलावा पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में भी विदेश मंत्रालय ने बेहतर कदम उठाये हैं। आंखों में आंखें डालकर बात करने की नीति को आगे बढ़ाया। एक तरफ जहां डोकलाम पर चीन को पीछे हटने पर मजबूर किया वहीं पाकिस्तान से पहले बेहतर संबंध बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान की आतंकनीति की वजह से उसे न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बेनक़ाब किया बल्कि हर मोर्चे पर उसे करारा जवाब दिया।

प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी स्वच्छता योजना के तहत सुषमा स्वराज ने विदेशों में स्थिति राजदूतावास में साफ-सफाई को नये मुकाम पर ले गयीं। इसकी तारीफ खुद प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में किया था।

शांत, सौम्य और मृदुभाषी छवि की सुषमा स्वराज विरोधियों के बीच भी खासी लोकप्रिय हैं। बीजेपी में मोदी युग से पहले वो प्रधानमंत्री पद तक की दावेदार तक मानी जाती थीं। 2008 में सुषमा स्वराज को उत्कृष्ट सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार पाने वाली सुषमा स्वराज देश की पहली महिला सांसद थीं। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सुषमा स्वराज को सम्मानित करते हुए उन्हें राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों की प्रखर वक्ता बताया था।

सुषमा स्वराज राज्यसभा और लोकसभा की कमेटियों का हिस्सा रही हैं। पहली बार सांसद बनने के बाद 1992 से 96 तक वो सरकारी आश्वासन समिति की सदस्य रहीं। 1996 से 98 के दौरान रक्षा समिति में रहीं। इसके अलावा गृह मामलों की समिति, लोकचार समिति, परामर्शदात्री समिति, नियमावली समिति, विदेश मामलों पर स्थायी समिति जैसे कमेटी का अहम सदस्य रही हैं।

7 बार सांसद और 3 बार विधायक बनने वाली सुषमा सबसे कम उम्र में कैबिनेट मंत्री बनीं तो उनके पति सबसे कम उम्र में राज्यपाल। सुषमा और उनके पति की उपलब्धियों के ये रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करते हुए उन्हें विशेष दंपति का स्थान दिया गया है। दोनों की एक बेटी हैं बांसुरी स्वराज जो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं। सुषमा स्वराज हरियाणा में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की चार वर्ष तक अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।

सुषमा स्वराज विदेश नीति को नये मुकाम तक ले जाना चाहती हैं। अपनी विदेश नीति को देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ने वाली सुषमा स्वराज अष्टम सूची में शामिल सभी भाषाओं में विदेश नीति का विस्तार करना चाहती हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का हर कदम प्रधानमंत्री मोदी के न्यू इंडिया की तरफ बढ़ रहा है।

” मंत्री नंबर-1 वर्ष 2018″ में फेम इंडिया ने एशिया पोस्ट के साथ मिलकर मंत्रियों की छवि, उनका प्रभाव, विभाग की समझ, लोकप्रियता, दूरदर्शिता और परिणाम जैसे कुल 10 बिंदुओं पर केंद्र सरकार के मंत्रियों का आकलन किया और उनमें उपरोक्त आकलन में sushma स्वराज ”शक्ति” कैटगरी में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर हैं.