कॉरपोरेट छोड़ चले गांव की ओर

भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में तकनीकी क्रांति की वजह से नयी पीढ़ी का रुझान अन्य क्षेत्रों की तरफ हो रहा है। ऐसे में पहली पीढ़ी के उद्यमी श्रीकुमार मिश्रा का जिक्र जरूरी है जिन्होंने टाटा ग्रुप की नौकरी छोड़ कर कृषि और डेयरी उद्योग की दिशा बदलते हुए करोड़ों रूपये की कंपनी बना ली।
यह कहानी है देश की पहली उद्यम-पूंजी समर्थित कृषि स्टार्टअप ‘मिल्क मंत्रा’ की आधारशिला रखने वाले श्रीकुमार मिश्रा की। ओडिशा के कटक में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के बाद भुवनेश्वर के प्रतिष्ठित जेवियर इंस्टिट्यूट से एमबीए की पढ़ाई की। टाटा ग्रुप में नौकरी भी लग गयी, लेकिन वे हमेशा अपने आस-पास की परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन करते रहते थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि उनके राज्य में दूध की भारी कमी है। यह कमी इन्हें एक बड़े कारोबार के अवसर के तौर पर दिखा और फिर सन् 2009 में शून्य से शुरू हुआ मिल्क मंत्रा। टाटा समूह के साथ काम करते हुए अपने आठ साल के कैरियर में श्रीकुमार ने टाटा टी द्वारा टेटली समूह के अधिग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अपने कॉर्पोरेट तजुर्बे का सही इस्तेमाल करते हुए इन्होंने देश में, विशेष रूप से ओडिशा में – किसानों के स्थायी नेटवर्क की मदद से एक शुद्ध और स्वस्थ डेयरी ब्रांड बनाने की प्रक्रिया शुरू की।
यह आइडिया इतना प्रभावशाली था कि कुछ ही महीनों में इन्होंने कई निवेशकों को आकर्षित करते हुए देश की पहली वेंचर कैपिटल आधारित कृषि स्टार्टअप ‘मिल्क मंत्रा’ को एक नयी उंचाई पर बिठा दिया। बाज़ार में मौजूदा ब्रांड को कड़ी टक्कर देते हुए वे पहले ही साल 18 करोड़ का रेवेन्यु हासिल करने में सफल रहे। एक के बाद एक कई निवेशों की मदद से इन्होंने जून 2011 में अपनी खुद की टेट्रा पैक की तकनीक विकसित कर ली, जिससे दूध को लंबे समय तक रखा जा सकता है। साल 2012 में इन्होंने डायरेक्ट-टू-होम डिलीवरी दूध जैसी सेवाओं के साथ भुवनेश्वर और कोलकाता में अपने उत्पादों का शुभारंभ किया।
श्रीकुमार ने मिल्क मंत्रा के बैनर तले 40 हज़ार से भी ज्यादा किसानों को एकजुट करते हुए 21वीं सदी में एक नयी श्वेत क्रांति को जन्म दिया। मिल्क मंत्रा की इतने कम समय में इतनी बड़ी उपलब्धि पर अध्ययन करने के लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन खुद कंपनी गये।
आज ‘मिल्क मंत्रा’ दूध के साथ-साथ कई अन्य डेरी उत्पादों को करोड़ों ग्राहकों तक पहुंचा रही है। कंपनी का सालाना टर्नओवर 120 करोड़ के पार है और साल 2017 में इसे 200 करोड़ के क्लब में शामिल करने के लिए श्रीकुमार पूरी तरह से समर्पित हैं। इतना ही नहीं कंपनी जल्द ही झारखण्ड और कर्नाटक में भी अपने प्रोडक्ट को लांच करने की दिशा में कार्यरत है। श्रीकुमार ने कठिन मेहनत और मजबूत इच्छा-शक्ति की बदौलत अपनी कंपनी को शून्य से शिखर पर बिठाया। अपने स्वर्णिम कॉर्पोरेट कैरियर को छोड़ दूध का कारोबार शुरू करने की साहस रखने वाले यह शख्स सच में सलाम करने योग्य हैं।