जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय है अभी का पल -श्यामा चोना

shyama-chonaपद्म भूषण डॉ. श्यामा चोना जीवन की उपलब्धियों की जीवंत मिसाल है। एक मेधावी छात्रा जिसने कॉलेज से ही समाज-सेवा शुरु कर दी थी, बाद में दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल की प्रिंसिपल बनीं और आज भी करीब 40 वर्षों से पैरेंटिग व शिक्षा जगत में बड़े बदलाव कर रही हैं। भारत का सर्वश्रेष्ठ सम्मान पद्मश्री और पद्म भूषण सहित दर्जनों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हैं। इनकी पहचान एक अलग जज्बे के लिये भी है। इनकी एक बेटी तमन्ना स्पेशल चाइल्ड है जो नौ साल की उम्र तक न बोल पाती थी और न ही बिना मदद के चल पाती थी। लेकिन इन्होंने तमन्ना को इस तरह मजबूत किया है कि आज वे दुनिया भर के स्पेशल चाइल्ड्स के परिवार वालों के लिये एक प्रेरणा बन गयीं। पैरेंटिग, अपनी सफल जिंदगी व तमन्ना से जुड़े अनुभवों के बारे में श्यामा चोना के विचार –

बचपन कैसा रहा?
ईश्वर को धन्यवाद कि उन्होंने मुझे एक सुख-सुविधा भरे परिवार में पैदा किया। मेरे पिता भारत सरकार के फाइनैंशियल कंट्रोलर थे और हमलोग लोदी एस्टेट में रहते थे। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थी मां ने हम सभी को हमेशा उम्दा संस्कार दिये जो मुझे आज भी परमात्मा के प्रति कृतज्ञ और लोगो के प्रति सहिष्णु बनाती है।

शिक्षा कहाँ हुई और कैसी रही ?
शुरुआती पढ़ाई अजमेर के सोफिया स्कूल और इसके बाद जयपुर के महारानी गायत्री देवी स्कूल में हुई जहां मैंने स्विमिंग, डांस, शिष्टाचार, बातचीत करने का सलीका आदि सीखा । तेज यादाश्त की वजह से मुझे हमेशा अच्छे नंबर मिले , मैं युनिवर्सिटी स्टूडेंट काउंसिल की प्रेसिडेंट थीं और फेमिना की राजस्थान से पहली संवाददाता भी बनी थी , मैंने एम् जी डी से ही ग्रैजुएशन में टॉप किया और ग्रैजुएशन करते यहीं से लेक्चरार की नौकरी का ऑफर मिला। । 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी सैनिकों व उनके परिवार वालों की मदद के अभियान में मैंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, बाद में मैंने दिल्ली आकर डीपीएस ज्वाइन किया था।

आपके जीवन का लक्ष्य क्या था ?
मेरी जिंदगी का उद्देश्य क्या है ये मेरी समझ से परे था लेकिन पाजिटिव करने की ललक शुरू से ही मन में लगी है , हमेशा लगता है कुछ और बेहतर करना है ,यह जज्बा पूरी उम्र मेरे साथ रहा है और शिक्षा और समाज के लिए बेहतर करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हूँ .

जिंदगी का सबसे कठिन समय कब आया?
कठिन क्या कहूँ पर एक बार तो थोड़ा परेशान अवश्य हुई जब करीब तीस साल पहले मेरी बेटी तमन्ना बड़ी होने लगी और उसकी दशा देख कर मुझे बहुत बेचैनी होने लगी। समझ लीजिये कि ईश्वर ने मुझे एक अधूरी गढ़ी हुई गुड़िया दी थी जिसमें बाकी का काम मुझे करना था। उसे सेरब्रल पल्सी नाम की बीमारी थी। मैं जानती थी कि तमन्ना के दिमाग में शब्द हैं, लेकिन वो अपनी जुबान पर कब उन्हें लाकर मुझे मम्मा बुलायेगी, यह सुनने के लिये मैं तरस गयी थी। तब मुझे लगा कि जिंदगी ने मुझे बड़ी चुनौती दी है। मैंने उससे उबरने की ठानी और तमन्ना को स्पेशल ढंग से पाला। मैंने तमन्ना को अमेरिका के डॉक्टरों को भी दिखाया और इलाज करवाया। सर्जरी के बाद उसने बोलना शुरु किया। उसने स्पेशल बच्चों के स्कूल में पढ़ा और ओपन स्कूल से दसवीं तथा बारहवीं की परीक्षाएं पास की। इतना ही नहीं, बाद में उसने नर्सरी टीचर्स ट्रेनिंग भी कंप्लीट की। आज तमन्ना डीपीएस में नॉर्मल बच्चों को पढ़ा रही है। अब वह योगा करती है, टेनिस खेलती है और जिंदगी में लगभग सब कुछ अच्छी तरह कर पाती है।

प्रोजेक्ट तमन्ना क्या है?
दरअसल, जब मैंने अपनी बेटी तमन्ना को स्कूल में दाखिल करने की कोशिश की तो बहुत मुश्किलें आयीं। हमारे देश में स्पेशल बच्चों के बारे में पढ़ाई के बहुत कम अवसर हैं। आंकड़ों के मुताबिक करीब हर 10 हजार बच्चों में एक बच्चा स्पेशल होता है, लेकिन इस दिशा में सोचने वाले कम ही हैं। मैंने 1984 में तमन्ना के नाम पर स्कूल शुरु किया जो इन्हीं बच्चों की शिक्षा और उनके पुनर्वास तक के लिये काम कर रहा है। इसकी कई शाखाएं भी हैं- ‘नयी दिशा’ और ‘स्कूल ऑफ होप’ जो साउथ दिल्ली में हैं। इन स्कूलों ने ऑटिज्म और सेरब्रल पल्सी जैसी बीमारियों से पीड़ित सैकड़ों बच्चों को जिंदगी जीने का नया तरीका सिखाया है। दी मिलेनियम स्कूल में भी छोटी क्लास में हमने स्पेशल बच्चो को साथ साथ पढ़ाने की शुरुआत की है।

आप इतने अवॉर्ड और सम्मान पा चुकी हैं, क्या महसूस करती हैं?
मैं हमेशा से कर्म पर भरोसा करने वाली रही हूं और मैंने सदैव अपने काम को इंजॉय किया। मैंने हमेशा अपने काम में ईमानदारी बरती है। सम्मान मिलता है तो अच्छा लगता है, लेकिन साथ ही बड़ी जिम्मेदारियां भी आ जाती हैं और प्रयास करती हूं इन अवॉर्ड्स की कसौटी पर हमेशा खरा उतरने की ताकि समाज के लिये अधिक से अधिक कुछ कर सकूं।

आपकी जिंदगी की फिलॉसफी क्या है?
मेरा मानना है कि जीवन में सबसे खूबसरत पल है ‘अभी’ का पल। इस पल को ज्यादा से ज्यादा बेहतर बनाने की कोशिश कीजिये तो जिंदगी खुशहाल रहेगी। मैंने एक किताब पढ़ी थी- ‘आई एम ओके, यू आर ओके’ जिसमें बताया गया है कि जिंदगी बचपन को दोबारा जीने की कला है। यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है और मेरी प्रेरणा का स्रोत भी।

शिक्षा और पैरेंटिंग पर कुछ टिप्पणी
हर अभिभावक के लिये अपने बच्चों की समस्याओं के समाधान के लिये अलग से ट्रेनिंग लेना व्यवहारिक तौर पर लगभग असंभव है। बच्चों के सर्वांगीन विकास लिये उसके माता-पिता या अभिभावक को प्यार और व्यवहारिकता की बेसिक जानकारी होना जरूरी है, जिससे उनके नन्हे भविष्य को अपना व्यक्तित्व निखारने में मदद मिलती है। आप अपने बचपन की कहानी बच्चे को सुनाएँ, क्योंकि वे बचपन की कहानियों को बहुत ही दिलचस्पी के साथ सुनते हैं। बच्चे अपने माता-पिता और दादा-दादी के बचपन के अच्छे कार्यों के बारे में सुनकर काफी प्रभावित होते हैं। वे अपने आपको पिता के समान उत्साही तथा दादी की तरह उदार बनाने की कोशिश करते हैं।

फेम इंडिया के माध्यम से कोई संदेश?
बच्चों से कहना चाहूंगी कि बड़ों का सम्मान करो। अगर माता-पिता या अभिभावक से कोई परेशानी है तो ठंढे दिमाग से बातचीत कर सुलझाओ। दुनिया में खुद को कभी अकेला मत समझो, बड़े तुम्हारी भलाई ही चाहते हैं।