इरादों की मजबूती से बनाई एक नई राह – शालिनी

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कहते हैं जब जज्बा हो कुछ करने का तो रास्ते निकल ही जाते हैं , प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने में किया गया प्रयास ही किसी को नई पहचान देता है और वही पहचान अन्य लोगों के लिये प्रेरणा का काम करती है. जहाँ तक नारी सशक्तिकरण की बात है तो यही नारी की अलग पहचान ही उनकी ताकत है , बस जरुरत है तो दृढ इच्छाशक्ति की. यहाँ  चर्चा कर रहे हैं  शालिनी की. बिहार के दरभंगा की शालनी आयकर विभाग में अधिकारी हैं. इनका जीवन जितना संघर्षपूर्ण रहा उतना ही प्रेरणादायक भी.

इन्होंने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई दरभंगा से ही की है. पढ़ाई के दौरान ही इनके पिता की मृत्यु हो गई. परिवार में चार भाई बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण एक बड़ी जिम्मेवारी इनके और इनकी माँ के ऊपर आ गई. एक ओर करियर का दबाव और दूसरी ओर छोटे शहर में संसाधनों की कमी. ऐसी परिस्थिति में भी शालिनी ने हिम्मत नहीं हारी और करियर में आगे बढ़ने को जुट गई. वर्ष 1999 में एसएससी और अन्य कंप्टिशन की तैयारी का दौरान इन्हें ये महसूस हुआ कि ग्रुप एजुकेशन और डिस्कशन सफलता के लिये जरुरी है परन्तु वहां आस-पास कोई ऐसा संसाधन विकसित नहीं था. “आवश्यकता अविष्कार की जननी है” और वहीं से एक नई शुरुआत हुई जो आज सैकड़ों बच्चों की सफलता का माध्यम बन रहा है .

घर के छोटे से कमरे में अपनी माँ के सहयोग से इन्होंने जरुरी व्यवस्था की ताकि आसपास के स्टुडेंटस को वहां इकठ्ठा हों और ग्रुप एजुकेशन में कोई परेशानी न हो.धीरे-धीरे यह क्षेत्र में सफलता के लिये प्रयासरत छात्र -छात्राओं के लिये एक बेहतरीन एजुकेशन सेंटर बन गया जहाँ जरूरतमंद स्टुडेंटस बिना किसी फीस के एक बेहतर माहौल में सही तरीके से तैयारी कर सकें. यूँ तो शालिनी जी ने वर्ष 2001 में कंप्टिशन में सफलता पाई और जॉब के लिये दिल्ली आ गयीं, जहाँ पहली जॉब मंत्रालय में थी, फिर उन्होने वर्ष 2003 में इंकमटैक्स इंस्पेक्टर के तौर पर ज्वाईन किया. 2009 में इंकमटैक्स ऑफिसर बनीं , पर इनके द्वारा शुरु की गई ग्रुप एजुकेशन आज भी हर साल बहुत से बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई  का बेहतर माहौल और सफलता की राह दिखा रहा है. जिसकी देखरेख लगातार इनकी माँ करती आ रही हैं और शालिनी और इनके भाई-बहन समय-समय पर दरभंगा प्रवास के दौरान उन बच्चों  को जरुरी मार्गदर्शन देते रहते हैं.