अध्यात्म और समाज सेवा का संगम: साध्वी संघमित्रा

अपनी मधुर और सम्मोहक वाणी से भक्तों को भक्ति रस में डुबो देने वाली साध्वी संघमित्राजी बचपन से ही वीरायतन, बिहार से जुड़ी हुई हैं. इन्हें पहले मंगलमजी के नाम से भी जाना जाता था. आचार्य चंदना जी के मार्गदर्शन में ये वीरायतन ग्लोबल के माध्यम से समाजसेवा में बड़ी भूमिका अदा कर रही हैं. साध्वी संघमित्राजी अपने प्रवचनों व मधुर भजनों के माध्यम से युवाओं में अध्यात्म और जन कल्याण की भावना पैदा करती हैं और जीवन में बेहतर करने के लिए प्रेरित भी करती हैं.

साध्वी संघमित्राजी विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं. 6 साल की उम्र में ही इन्हें भक्तामर, कल्याण मंदिर, तत्वार्थ सूत्र और दूसरे जैन स्तोत्र कंठस्थ थे. इन्हें परम पूज्य गुरुदेव अमर मुनिजी महाराज और आचार्य श्री चंदनाजी महाराज के दिव्य मार्गदर्शन में धार्मिक ग्रंथों और प्राचीन भाषाओं जैसे संस्कृत और प्राकृत का अध्ययन करने का अवसर मिला है। साध्वी संघमित्रा की अद्भुत मधुर आवाज़ लोगों में एक तरह का सम्मोहन पैदा करती है और इसका नतीजा ये होता है कि लोग उनकी बात ना सिर्फ सुनते हैं बल्कि मानने भी लगते हैं. इनके गाये भजन दुनियाभर में पसंद किये जाते हैं.

प्रभु भक्ति की प्रेरणा देते हुए साध्वी संघमित्रा जी कहती हैं कि इस घोर कलयुग में परमात्मा के प्यार व भक्ति की चर्चा इस प्रकार लगती है जैसे तपती हुई धरती पर बरसात की बूंद पड़ रही हो। उनके अनुसार प्रभु की महज चर्चा मात्र से ही इंसान के दिलो दिमाग को शांति मिलकर खुशियों की लहर उठती है जो कि उसकी चिंता, परेशानियों व मुश्किलों को काफी हद तक खत्म कर देती है। वो बताती हैं कि जप करने से व्यक्ति का अपने ईष्ट देव से सीधा जुड़ाव हो जाता है। जप करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और हमारा झुकाव धर्म और अध्यात्म की ओर बढ़ता है।

दीक्षा लेने से पहले साध्वी संघमित्रा जी कई साल अमेरिका में रही हैं. उन्होंने आचार्य श्री चंदनाजी के आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण के संदेशों को सुन्दर गीतों में पिरोया है और उन्हें दुनियाभर के लोगों तक पहुंचाया है. अमेरिका से भारत लौटने पर संघमित्रा जी ने दीक्षा ग्रहण की. जैन दीक्षा दो चरणों में पूरी होती है: प्रारंभिक दीक्षा और इसके 6 महीने के बाद बड़ी दीक्षा. मंगलम की प्रारंभिक दीक्षा 20 दिसंबर 2011 को भारत के वीरायतन , राजगीर, में हुयी. आरंभिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें एक नया नाम साध्वी संघमित्रा दिया गया. 8 अप्रैल, 2012 को कैलिफ़ोर्निया के मिल्पीटास (सैन फ्रांसिस्को) कैलिफ़ोर्निया के जैन सेंटर में बड़ी दीक्षा हुई. यह संयुक्त राज्य अमेरिका और उत्तरी अमेरिका के पूरे जैन समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी क्योंकि यह देश और महाद्वीप में पहला दीक्षा समारोह था। आचार्य श्री चंदना जी द्वारा साध्वी संघमित्रा को बड़ी दीक्षा दी गयी.

अपनी गुरु परमपूज्य आचार्य श्री चंदना जी की कृपा से साध्वी संघमित्रा को जीवन के प्रति उचित और आध्यामिक दृष्टिकोण मिला. अध्यात्म की ओर झुकाव उनमें जन्मजात था. इसी के चलते इन्होंने जीवन की सभी सुख-सुविधाओं का त्याग करके निर्लिप्त भाव से अध्यात्म का मार्ग चुना. लोभ-मोह से मुक्त होकर भौतिकता से दूर होकर जीवन को अध्यात्म और समाज कल्याण के लिए समर्पित कर देना बहुत दुष्कर काम है. ऐसा विरले ही करते हैं. साध्वी संघमित्रा ऐसे ही विरले लोगों में से एक हैं.

शक्तिशाली नारी शक्ति के इस सर्वे में फेम इंडिया मैगजीन – एशिया पोस्ट ने नॉमिनेशन में आये 300 नामों को विभिन्न मानदंडों पर कसा , जिसमें सर्वे में सामाजिक स्थिति, प्रतिष्ठा, देश की आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव, छवि, उद्देश्य और प्रयास जैसे दस मानदंडों को आधार बना कर किये गये स्टेकहोल्ड सर्वे में वीरायतन से जुड़ी जैन साध्वी संघमित्रा पच्चीसवें स्थान पर हैं |