मंजिलें उनको ही मिलीं इरादे हैं बुलंद जिनके -आर के सिन्हा

वो कहते हैं ना कि अगर इरादे बुलंद और मजबूत हों तो कोई भी मंज़िल मुश्किल नहीं होती। बस जरूरत है दृढ़ निश्चय और सशक्त-संकल्प के साथ निशाना साधने की। सफलताएं न कभी परिस्थितियों की गुलाम रही हैं, न होंगी, पर संघर्ष के समय में आदमी जरूर विषम-परिस्थितियों का गुलाम हो जाता है। हालांकि वही आदमी अगर उन्हीं गुलामी के बंधनों को तोड़ते हुए लगन और मेहनत के साथ आगे बढ़ता है तो एक दिन निश्चित ही इतिहास रच देता है। और यही इतिहास रचा देश के सबसे धनी राजनेताओं में से एक भाजपा की ओर से राज्य सभा सांसद रवीन्द्र किशोर सिन्हा ने। सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज इंडिया का कारोबार उन्होंने महज़ 700 रुपए से शुरू किया था। इसे 4000 करोड़ तक लाने वाले ग्रुप के संस्थापक एवं चेयरमैन रवीन्द्र किशोर सिन्हा ने सच मायने में एक ऐसा प्रेरणादायक इतिहास रचा है जो आधुनिक युग के युवा उद्यमियों का उत्साह बढ़ाने के साथ रास्ता दिखाने वाला है। फेम इंडिया से बातचीत के प्रमुख अंश

rk-sinha-pg-1शुरुआती जीवन कैसा रहा?

जन्म बिहार के बक्सर में लोअर मिडिल क्लास फैमिली में हुआ। कुल सात भाई-बहन थे और पिता जी मामूली सरकारी नौकरी में थे। साफ कह दिया था कि अगर उच्च शिक्षा हासिल करनी है तो खर्चे की व्यवस्था खुद करनी होगी। मैंने स्कॉलरशिप हासिल की और ट्यूशन पढ़ा कर पैसे का जुगाड़ किया। पॉलिटिकल साइंस और लॉ में ग्रेजुएशन किया। घर में जरुरत का सबकुछ था पर खुद को स्थापित करने के लिये 1971 में न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर की नौकरी शुरू की। जल्दी ही बिड़ला घराने के अखबार द सर्च लाइट में नौकरी मिल गयी। 1971 में जब बांग्लादेश की आजादी को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ तो मैंने बॉर्डर पोस्ट पर और बांग्लादेश में जाकर सेना के साथ रहकर रिर्पोटिंग की। मैं बेलाग और निष्पक्ष लिखता था जिससे सरकार बहुत खुश नहीं रहती थी। तत्कालीन सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी मैंने दर्जनों कटु आलोचनात्मक लेख लिखे। शायद मालिकों के सरकार से रिश्ते बिगड़ने लगे थे और नतीजा ये निकला कि 1974 में मुझे एक महीने की एडवांस सैलरी देकर नौकरी से निकाल दिया गया।

फिर तो अचानक परेशानी आ गयी होगी?

मैं 1970 से लोकनायक जयप्रकाश नारायण से ही जुड़ा रहा था। जब जॉब छूटी तो उनके यहां पहुंचा। उन्होंने कहा कि मैं कुछ ऐसा करूं जिससे ग़रीबों के दिल को छू सकूं। 1971 के भारत-पाक युद्ध की कवरेज के दौरान मेरी भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों से दोस्ती हो गयी थी। युद्ध खत्म होने से बिहार में भी हजारों सैनिक बेरोजगार हो गये थे। मैंने भूतपूर्व सैनिकों के पुनर्वास हेतु सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विस चलाने की ठान ली। मेरे एक मित्र मिनी स्टील प्लांट चलाते थे, जिन्हें रामगढ़ (झारखंड) में अपने प्रोजेक्ट-साइट की सुरक्षा के लिए सेना के रिटायर्ड जवानों की जरूरत थी। मैंने कहा कि मैं  कुछ जवानों को जानता हूं तो उसने एक सुरक्षा कंपनी बनाने की सलाह दी। उस सलाह को मैंने हाथों-हाथ लिया। पटना में ही एक छोटा गैराज किराये पर लेकर यह काम शुरू कर दिया। मेरी उम्र उस वक्त महज़ 23 साल थी।

छोटी उम्र और अनुभव की कमी के कारण क्या मुश्किलें आयीं?

थोड़ी परेशानी तो आयी, लेकिन सहयोगी अच्छे मिले जिससे मुश्किलें कम होती चली गयीं। सबसे पहले सेना के 35 रिटायर्ड जवानों को नौकरी दी। इस तरह 1974 में एसआईएस अस्तित्व में आ गयी। निजी सिक्योरिटी गार्डों से सुरक्षा उस वक्त एक नया कॉन्सेप्ट था, लेकिन काम मिलने लगा। व्यवसाय के लिये संतुष्ट ग्राहक सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। मैंने भी क्वालिटी में कोई कमी नहीं रखी। पहले साल के अंत तक कंपनी के कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 250-300 हो गई और टर्नओवर 1 लाख रुपये से ज्यादा हो गया। उत्साह बढ़ा तो कई कंपनियों से व सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों से संपर्क साधा। कुछ ही सालों में गार्ड्स की संख्या बढ़कर लगभग 5000 हो गयी और कंपनी का टर्न ओवर एक करोड़ से ऊपर पहुंच गया था। फिर कारोबार बढ़ने लगा।

कई चुनौतियां भी आयी होंगी?

rk-sinha-pg-2कई चुनौतियां आती हैं जिनसे पार पाना थोड़ा कठिन लगता है लेकिन धैर्य, समर्पण और कड़ी मेहनत हर चुनौती को परास्त कर देता है। एक बार बिहार विद्युत बोर्ड ने सरकारी गार्ड तैनात करने का फैसला लिया तो हमारे लगभग एक हजार जवानों के सामने बेरोजगारी का संकट मंडराने लगा। मैंने अपने बुजुर्गों से सीखा था कि दिक्कतों और चुनौतियों से घबराने की बजाय उसको हल करने के तरीके ढूंढना चाहिये। मैंने कई बिजनेस घरानों में जाकर उनका विश्वास जीता और किसी तरह उन सब की नौकरी बचाने का इंतजाम कर लिया। व्यापार में रेवेन्यू से ज्यादा महत्वपूर्ण मार्केट और लोगों के बीच अपनी कंपनी की साख, नाम और सम्मान बनाना होता है। आज की स्थिति यह है कि एसआईएस ग्रुप में सवा लाख से ज्यादा स्थायी कर्मचारी हैं। भारत में 250 से भी ज्यादा कार्यालय हैं। सभी 28 राज्यों के 600 से ज़्यादा जिलों में कारोबार फैला हुआ है। हमने अंतर्राष्ट्रीय होते हुए 2008 में ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित कंपनी चब सिक्युरिटी का अधिग्रहण किया था। 2016 मे कंपनी का टर्नओवर 4000 करोड़ के पार हो गया और यह लगातार बढ़ ही रहा है।

राजनीति में कैसे आये?

राजनीति को मैं समाज-सेवा मानता हूं और इसमें शुरु से रहा हूं। कई समाजसेवी संगठनों को बतौर संरक्षक मदद करता हूं और कई सामाजिक कार्यों में सक्रिय योगदान देता हूं। पटना के चित्रगुप्त मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष भी हूं और शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान देता हूं। देहारादून में सुविख्यात इंडियन पब्लिक स्कूल को हमारा संस्थान व्यापार के लिये नहीं सेवा के लिये चलता है। हमारी एक सामाजिक-मुहिम ‘संगत-पंगत’ है जिसके तहत हम सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी गरीब की जिंदगी इलाज़ के अभाव में न जाने पाये, कोई मेधावी बच्चा धन के अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित न रह जाये। अनगिनत सामूहिक एवं दहेज-रहित विवाह सम्पन्न कराये हैं। हम जल्द ही दिल्ली में भी एक मुफ्त मल्टी स्पेशियलिटी ओपीडी की व्यवस्था करने वाले हैं। पटना, कानपुर और लखनऊ में भी ओपीडी खोलने की योजना है।

फेम इंडिया के माध्यम से युवाओं को क्या संदेश देंगे?

आज के युवा को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनना चाहिये। उसे रोजगार लेने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बनने की ओर अग्रसर रहना चाहिये। अगर किसी को बिजनेस में प्रवेश करने से पहले किसी कंपनी मे काम कर अनुभव प्राप्त करे। उद्यमी बनने के लिए समय विशेषज्ञता से अधिक जज्बे की जरूरत होती है। मंजिल निर्धारित करने से पूर्व गहन अनुसंधान और फिर रास्ता तय करना चाहिये।

—————— ——————— ——————————-

राजनीति में आरके

राजनीतिक गलियारों में सिन्हा ‘आर के’ के नाम से चर्चित हैं। भारतीय जनसंघ से उसके गठन (1951) के 14 साल बाद, 1966 में जुड़े। उस समय उनकी उम्र 15 साल थी। 1966 में इनकी पं. दीनदयाल उपाध्याय से मुलाकात हुई और उन्होंने ही सिन्हा को आरएसएस कैंप से निकलकर जनसंघ में काम करने को कहा। आरएसएस ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों के विस्तार के लिये ही जनसंघ बनाया था। आरएसएस के कार्यकर्ता जनसंघ के सदस्य थे। जनसंघ 1980 में बीजेपी में बदल गया। इस तरह सिन्हा बीजेपी से जुड़ गये। इन्होंने बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ भी काफी काम किया है। कई चुनावों में देश भर में सक्रिय रहे। गांव के युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने में भी ये सरकार की मदद करते हैं। बीजेपी ने 2014 में राज्य सभा भेजा। वे जेपी की लीडरशिप में बिहार में हुए छात्र आंदोलन पर पहली रिसर्च बुक जनआंदोलन के लेखक भी हैं।