मैम की डायरी

आज संडे था.. सोचा था कि पूरे हफ्ते की थकान उतारुंगी। इसीलिये फोन भी ऑफ कर दिया था, लेकिन सुबह-सुबह ही लैंड लाइन पर मिसेज गोम्स का फोन आ गया। स्कूल में आज कुछ क्लास के बच्चे पिकनिक पर जा रहे थे और स्टैंडर्ड 7 बी की क्लास टीचर अचानक छुट्टी पर चली गयीं सो मुझे बुलावा आ गया। मैं स्टैंडर्ड 8 सी की क्लास टीचर हूं और मेरी क्लास पिछले हफ्ते ही पिकनिक से आयी है सो मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी दोबारा वही सब देखने की, लेकिन वाइस प्रिंसिपल का ऑर्डर था, मानना ही पड़ा।

स्कूल की पिकनिक वैसी नहीं होती जैसी हमलोग फैमिली आउटिंग में करते हैं। यहां कोई बाहर खाना बनाने और खाने का माहौल नहीं होता। हमारे स्कूल में बड़े-बड़े घरों के बच्चे आते हैं, उनके गार्जियन उनके खाने पर हजारों रुपया खर्च करते हैं। पिकनिक एक एम्यूजमेंट पार्क में है और वहां बच्चों को सभी राइड्स का मजा लेना है। खाने का इंतजाम भी पार्क के पैकेज में है। एक साथ सभी बच्चों के लिये टिकट खरीदने पर पार्क वाले हेवी डिस्काउंट देते हैं, जो प्रिंसिपल के खाते में जाता है। खैर पैसा उतना बड़ा इश्यू नहीं है। न स्कूल के लिये, न बच्चों के लिये। ये हजार-बारह सौ रुपये पिकनिक पर खर्च करने से न सिर्फ बच्चों का एक दिन हंसी-खुशी गुजर जाता है, बल्कि उनका आउटलुक भी ब्रॉड होता है।

हमारा स्कूल वैसे तो कहने को एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन यानी एनजीओ के द्वारा चलाया जाता है, लेकिन यह शहर के सबसे महंगे स्कूलों में से है। बच्चों से ट्यूशन फीस, ट्रांस्पोर्टेशन फीस के अलावे, डेवलपमेंट, कंप्यूटर, क्लीनलिनेस, सोशल वेलफेयर और न जाने क्या-क्या दर्जनों तरह के फीस वसूले जाते हैं। फीस है तो सुविधाएं भी हैं। ऑडियो-विजुअल प्रेजेंटेशन, सीसी टीवी कैमरा, आर ओ सिस्टम, हाउस कीपिंग, माली, स्वीपर, आया औऱ न जाने कितनी ऐसी चीजें हैं जो किसी सरकारी या फिर सस्ते स्कूल के बच्चे सोच भी नहीं सकते। यही वजह है कि उन स्कूलों में साल भर ‘ऐडमिशन ओपन’ का बोर्ड लगा रहता है, लेकिन कोई भीड़ नहीं रहती, जबकि हमारे ऐडमिशन क्लोज होते ही डीएम से लेकर सीएम तक की सिफारिशों के खत और फोन आने लगते हैं और हमारी प्रिंसिपल मैम को ज्यादातर मामलों में सबको खेद के साथ मना करना पड़ता है।

बच्चों के आउटलुक पर हमलोग हमेशा ध्यान देते हैं और यही वजह है कि हर महीने हम बच्चों को ढेर सारे प्रोजैक्ट्स कंप्लीट करने को कहते हैं। पिछले पैरेंट्स टीचर मीट में कई गार्जियंस शिकायत करने लगे कि प्रोजैक्ट्स कंप्लीट करने में उन्हें बाहर के एक्सपर्ट की मदद लेनी पड़ जाती है। लेकिन हमारी प्रिंसिपल मैम ने भी उन्हें समझा दिया कि प्रोजैक्ट्स कितने जरूरी हैं बच्चों के दिमाग में कोई भी चीज भरने के लिये। अगर सोलर सिस्टम के लिये छोटी बड़ी गेंदों से मॉडल बना दिया जाये तो बच्चों को रट्टा मारने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसी तरह इकोलॉजी या एनाटॉमी के मॉडल बच्चों के दिमाग में पूरी तरह घुस जाते हैं। दरअसल पुराने स्टूडेंट्स के गार्जियंस को यह बात पता है, इसलिये वे शिकायत नहीं करते, लेकिन जो बच्चे किसी सरकारी स्कूल से यहां आते हैं उन्हें पढ़ाई का ये तरीका थोड़ा अटपटा लगता है।

हमारे स्कूल में पढ़ाने के तरीके पर ही नहीं, डिसिप्लीन और पंक्चुअलिटी पर भी खासा ध्यान दिया जाता है। बच्चों के साथ-साथ टीचर्स को भी सारे रूल्स फॉलो करने होते हैं। टाइम टेबल से लेकर डायरी मेंटेन करने तक। एक सेक्शन में 25 से ज्यादा बच्चे नहीं होते इसीलिये टीचर्स पर ज्यादा प्रेशर नहीं रहता। हालांकि हमलोगों की सैलरी बहुत अधिक नहीं होती, लेकिन काम का प्रेशर भी कम रहता है। हां एक बार इस डिसिप्लीन में ढलने की जरूरत होती है। हमारी प्रिंसिपल मैम का कहना है कि न खुद ज्यादा स्ट्रेस लूं और न बच्चे पर प्रेशर डालूं। हमारे स्कूल का रिजल्ट भी इसीलिये बढ़िया रहता है कि हम बच्चों की लर्निंग पर ध्यान देते हैं, उनपर कोई पढ़ाई थोपते नहीं। हमारे स्कूल में लगभग सभी कक्षाओं के बच्चे स्मार्ट क्लास में ही पढ़ते हैं।

मैंने स्कूल की पढ़ाई इंग्लिश मीडियम में की थी और ग्रैज्युएशन के बाद एम ए, बीएड, कंप्यूटर्स और न जाने क्या-क्या डिग्रियां ले ली, ज्यादातर शादी के पहले ही, लेकिन जब गृहस्थी शुरु हुई तो बाल-बच्चों में ऐसी उलझी कि कुछ करने का मौका ही न मिला। बच्चे स्कूल जाने के काबिल हुए तो मैंने कुछ करने की सोची। मेरे पति का तबादला नागपुर हुआ तो मैंने इस स्कूल में ट्राई किया। हालांकि सैलरी बहुत अच्छी नहीं मिली, लेकिन मेरे एक बच्चे के स्कूल की फीस माफ करने और दूसरे की आधी करने का ऑफर मिला, यही बहुत बड़ा सपोर्ट था। मैंने फौरन हां कर दी। दरअसल हर स्कूल को कागजों पर दिखाना पड़ता है कि कुछ बच्चों की पढ़ाई फ्री में हुई, तो हमारे स्कूल में सभी स्कूल स्टाफ यहां तक कि माली, पिउन और दरबान तक के बच्चों का दाखिला दिखा दिया गया है। एक तरफ जहां स्कूल में रेग्युलर ऐडमिशन वाले एक-एक बच्चे की हाजिरी पर पूरा ध्यान रखा जाता है, वहीं इन बच्चों के बारे में कोई पूछता तक नहीं।

जब इस स्कूल में पढ़ाने आयी तो स्मार्ट क्लास का गैजेट चलाने में थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन जब डिजिटल बोर्ड बनाने वाली कंपनी के इंजीनियरों ने ट्रेनिंग में सिखाया तब पता चला कि इसके जरिये पढ़ाना कितना आसान होता है। हमारी हर कोशिश होती है कि बच्चे के दिमाग में सबजेक्ट पूरी तरह समा जाये ताकि उसे जीवन के किसी भी क्षेत्र में परेशानी न आये। पैसे वालों के हाई-फाई स्कूल में सैलरी बेशक कम मिले, नौकरी ज्यादा मुश्किल नहीं है। अब संडे खत्म हुआ कल से फिर वही मंडे टू सैटर्डे।