राजनीति में आने का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक मूल्यों की स्थापना

अपने छात्र जीवन से ही अंजुम आरा सामाजिक और राजनीतिक गतिविधि में सक्रिय भूमिका निभाती आ रही हैं। उन दिनों में ही अंजुम ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सहयोग से मानवाधिकार कार्यकर्ता के रुप में जेल सुधार से संबंधित कई अहम कार्यों को अंजाम देने में कामयाब रहीं। इसी दौरान ‘बंदियों के अधिकार एवं कर्तव्य’ नामक पुस्तक भीलिखीं, जिसका विमोचन सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर ने किया था।

पटना विश्वविद्यालय से विधि में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद यहीं पर उच्च न्यायालय में वकालत करने लगीं। साथ ही सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी रहीं। अंजुम जिला बार काउंसिल की निर्वाचित सदस्य भी रहीं। वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनसरोकार से संबंधित के नीतियों एवं कार्यों से प्रभावित होकर अंजुम ने राजनीति में कदम रखा और जनता दल यू (जदयू) की सदस्य बन गर्इं। इस तरह करीब चार वर्ष तक पार्टी में कार्य करने के बाद राजनीति में इनका कद बढ़ने लगा। इनके कार्यों से प्रभावित होकर राज्य सरकार ने इन्हें बिहार राज्य भंडार निगम का निदेशक बना दिया।

कार्यशैली के चलते राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर मनोनयन हुआ। इस दौरान अंजुम ने महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हेतु कई प्रयोग किए, जिनमें सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम रहा ‘महिला आयोग आपके द्वार’। अंजुम का हमेशा प्रयास रहा कि कोई भी पीड़ित महिला अपनी समस्या का समाधान लिए बिना वापस न लौटे। इस लक्ष्य में वे काफी हद तक सफल भी रहीं। विलक्षण जीवटता के चलते जदयू ने इन्हें प्रदेश प्रवक्ता के तौर पर अहम जिम्मेवारी सौंपी है, जिसे बखूबी निभा रही हैं। अंजुम आरा का राजनीति में आने का एकमात्र उद्देश्य समाज के वंचितों को मुख्य धारा से जोड़ने के साथ महिला सशक्तिकरण, शिक्षा में सुधार एवं संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करते हुए हर तबके को अधिकार दिलाना है। फेम इंडिया-एशिया पोस्ट ने अपने ताजा सर्वे में उन्हें बिहार के 40 प्रतिभाशाली युवाओं में पाया है।