साहित्य और पत्रकारिता की धवल चोटी हैं मृणाल पांडे

साहित्य और पत्रकारिता में अर्धशतक मार चुकीं मृणाल पाण्डेय की शख्सियत रखते समय शब्द कम पड़ने लगते हैं. पत्रकार, कहानीकार, संपादक और निबंधकार- क्या नहीं हैं मृणाल. 21 साल में उनकी पहली कहानी हिंदी साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ में छपी और तब से लेखन का सफ़र चलता ही रहा है.

मृणाल पांडे जानी-मानी उपन्यासकार एवं लेखिका स्व. शिवानी की बेटी हैं.आप कह सकते हैं कि मृणाल को साहित्य विरासत में मिला है. उनका जन्म टीकमगढ़, मध्यप्रदेश में 26 फरवरी 1946 को हुआ था. शुरुआती पढ़ाई नैनीताल, उत्तराखंड में हुई. उसके बाद मृणाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया. इन्होंने अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, शास्त्रीय संगीत तथा ललित कला की शिक्षा कारकारन, वाशिंगटन से पूरी की.

अपनी प्रतिभा और लगन के बूते आज मृणाल पाण्डेय सफलता की उस ऊंचाई पर हैं, जहाँ वे दूर से ही दिखती हैं. मृणाल जब लिखती हैं ऐसा लगता है मानो शब्दों को उनके मायने मिल गये हों. वे भारतीय टेलीविज़न की जानी-मानी हस्ती हैं. वे प्रसार भारती की अध्यक्ष, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘वामा’ की संपादक, हिन्दी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ की समूह सम्पादक, ‘सेल्फ इम्प्लायड वूमेन कमीशन’ तथा पीटीआई बोर्ड की सदस्य भी रही हैं। इसके अलावा वो लोकसभा चैनल के साप्ताहिक साक्षात्कार कार्यक्रम ‘बातों बातों में’ का संचालन भी करती रही हैं। दूरदर्शन और स्टार न्यूज के लिए भी मृणाल ने काम किया है.

मृणाल पांडे ने अपनी कहानियों में शहरी जीवन और सामाजिक परिवेश में महिलाओं की स्थिति को केंद्रीय विषय बनाया है। तेजी से बदलता सामाजिक परिवेश और रिश्तों की उधेड़-बुन भी उनकी कहानियों में प्रमुखता से नजर आती है। हमारे समय में देवी की देवी (2000), बेटी की बेटी (1993), जो कि राम हाथ ठहराया (1993), विषय नारी (1991), अपना खुद का गवाह (2001) आदि उनकी कई चर्चित किताबें हैं। इसके अलावा मृणाल पांडे की ‘यानी कि एक बात थी’, ‘बचुली चौकीदारिन की कढ़ी’, ‘एक स्त्री का विदा गीत’ और ‘चार दिन की जवानी तेरी’ आदि कई प्रसिद्ध कहानियां रही हैं। ‘विरुद्ध’, ‘अपनी गवाही’, ‘हमका दियो परदेस’, ‘रास्तों पर भटकते हुए’ जैसे उनके उपन्यासों ने समाज को एक नई दिशा देने का काम किया है। ‘जहां औरतें गढ़ी जाती हैं’ उनका चर्चित आलेख रहा है। पिछले 50 सालों में मृणाल पांडे ने बहुत कुछ हासिल किया। सफलता के बहुत से मुकाम पाए। कई उपलब्धियां भी उनके नाम दर्ज हुईं.अपने जीवन में कभी कोई समझौता नहीं किया, भले ही इस वजह से नौकरी ही क्यों न छोड़नी पड़ी हो। आजादी मिली तो बहुत सारे प्रयोग किए और उनमें सफल भी रहीं.

साहित्य में उत्कृष्ट काम के लिए साल 2006 में मृणाल पाण्डेय को भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से भी नवाज़ा जा चुका है.

शक्तिशाली नारी शक्ति के इस सर्वे में फेम इंडिया मैगजीन – एशिया पोस्ट ने नॉमिनेशन में आये 300 नामों को विभिन्न मानदंडों पर कसा , जिसमें सर्वे में सामाजिक स्थिति, प्रतिष्ठा, देश की आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव, छवि, उद्देश्य और प्रयास जैसे दस मानदंडों को आधार बना कर किये गये स्टेकहोल्ड सर्वे में विख्यात साहित्यकार मृणाल पांडेय दसवें स्थान पर हैं |