दुनिया में हर अच्छे बदलाव की शुरुआत बहुत संघर्षपूर्ण होती है -महेश गिरी

 

 

समाज-सेवा को जीवन का लक्ष्य मानने वाले पूर्वी दिल्ली के सांसद महेश गिरी के जीवन की शुरुआत आम राजनेताओं से अलग एक ऋषि के रूप में हुई थी। इनके महामंडलेश्वर से राजनेता बनने की कहानी बहुत ही रोचक है। समाज-सेवा के क्षेत्र में आकर इन्हें अहसास हुआ कि सामाजिक बदलाव के लिये विधायिका का हिस्सा बनना अनिवार्य है और यही विचार इन्हें राजनीति में ले आया। महेश गिरी के जीवन का एकमात्र लक्ष्य मजबूत भारत और खुशहाल जनमानस है। इनका मानना है कि अपनी विशिष्टता को पहचानिये और उसका सम्मान कीजिये। महेश गिरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का भी हिस्सा रहे हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे भाजपा सांसद व पार्टी के राष्ट्रीय सचिव महेश गिरी की टीम फेम इंडिया से बातचीत के कुछ खास अंश –

mahesh-giriसमाज सेवा की प्रेरणा कहां से मिली आपको?

बचपन से ही अध्यात्म से जुड़ा रहा हूं। लोगों की तकलीफों को समझने की शुरुआत वहीं से हो गयी थी, पर आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़ने के बाद तो सेवा भाव और बढ़ गया। लोगों को करीब से समझ तो जाना काफी काम करना है समाज के लिये। बस अब उसी दिशा में सफ़र आगे बढ़ गया।

आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन के बारे में कुछ बतायें।

जन्म नासिक के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। शुरू से ही परिवार में धर्म कर्म होते देख बचपन से ही धर्म के प्रति आस्था जगी लेकिन विचार यूँ बदला कि 17 साल की उम्र में ही घर से निकल गया और तीन साल हिमालय में बिताये। कुछ वक्त गुजारने के बाद अपने गुरु की तलाश में गुजरात के जूनागढ़ में पहुंचा, जहां पहुंचकर पहली बार मेरे जीवन को एक दिशा मिली।

किस तरह की दिशा थी? हमने सुना है आप पीठाधीश भी रहे हैं?

जूनागढ़ के गिरनार में मेरी पहले गुरु की तलाश पूरी हुई और यहां मैं 25 साल की कम उम्र में ही मैं दत्तात्रेय पीठ का पीठाधीश बन गया। कई सालों तक मैं वहां कर्मकाण्ड करवाता रहा, लेकिन मानसिक शांति तब मिली जब मैं श्री श्री रविशंकर जी के सानिध्य में आया।

श्री श्री रविशंकर के सानिध्य में कैसे आये?

दत्तात्रेय पीठ का पीठाधीश रहते हुए एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मैं उनसे वक्ता के तौर पर काफी प्रभावित हुआ। धीरे-धीरे उनके विचारों को जाना, उनके मानवता के कार्यों के बारे में जाना तो उनके साथ जाने का मन हुआ। सन 2000 में मैं आर्ट ऑफ़ लिविंग का सदस्य बना और बाद में  संस्था का इंटरनेशनल डायरेक्टर भी बनाया गया।

आर्ट ऑफ़ लिविंग के किन सिद्धांतों से प्रेरित हैं?

आजकल जिन भी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा हूँ उनसे लड़ने की प्रेरणा मुख्यतः आर्ट ऑफ़ लिविंग से ही मिलती है। फिर चाहे वो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ाई हो या आदर्श ग्राम अभियान हो या फिर यमुना की सफाई का अभियान, सब में लड़ने की प्रेरणा मुझे गुरूजी और संस्था की नीतियों से ही मिलती है।

श्री श्री की ऐसी कौन सी खूबियाँ है जो आपको पसंद है?

वो बुद्ध की तरह शांत हैं तो किसी बालक की तरह चंचल भी, जितने सरल, उतने ही गंभीर जो शायद ही किसी और में देखने को मिले। मानवता के लिये उनका सुनियोजित ढंग से किया जाने वाला काम मुझे काफी प्रभावित करता है। गुरूजी चाहते है कि अध्यात्म का विकास हो क्योंकि बिना अध्यात्म के किसी भी क्षेत्र का विकास असंभव है। वो ये भी मानते हैं कि देश का विकास ये नहीं है कि हॉस्पिटल बढ़ जायें, बल्कि विकास वो है कि मरीज़ कम हो, जेल कैदियों से ना भरे बल्कि लोग अपराध ना करें। बस उनकी यही बातें मुझे काफी प्रेरक लगती है।

आपके सपनों की शुरूआत कहां से हुई?

जब मैं आर्ट आफ लिविंग के साथ जुड़ा तो कई समाज सेवा के काम शुरू किये और एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिये कोई और भी राह तलाशनी होगी। मैं ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट के संस्थापक सदस्य के तौर पर भी जुड़ा।

यही तलाश आपको राजनीतिक गलियारों में ले आयी?

हां, समाज सेवा के माध्यम से लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है, लेकिन निर्णायक कामों, जैसे पानी, बिज़ली या फिर भ्रष्टाचार आदि की समस्याओं से निपटने के लिये राजनीति ही सबसे जरूरी माध्यम है।

क्या कोई खास घटना घटी, जिसके बाद अपने फैसला कर लिया कि अब राजनीति में जाना ही है?

दुनिया में हर अच्छे बदलाव की शुरुआत बहुत संघर्ष पूर्ण होती है। पूर्वी दिल्ली में कोंडली के पास एक इलाका है जहां पिछले 28 सालों से पानी की लाइन नहीं है और लोग टैंकर से भर कर पानी पी रहे है। मैं एक धार्मिक यात्रा में वहां गया था तो पाया कि वो अन ऑथोराइज़्ड कॉलोनी है इसीलिये वहां ये परेशानी है।  भले ही कॉलोनी अन-ऑथोराइज़्ड हो पर लोग तो अन-ऑथोराइज़्ड नहीं है ना?  पता चला कि एक छोटे से राजनीतिक पेंच के कारण ये लोग मूलभूत सुविधा से महरूम है। बस तभी तय कर लिया कि ऐसी परेशानियों की दिशा और दशा बदलने के लिये राजनीति में जाना ही होगा। अक्टूबर 2013 में मैंने औपचारिक तौर पर आर्ट ऑफ लिविंग से इस्तीफा दिया, फिर भाजपा के साथ जुड़ गया।

इतने सालों के कैरियर में आप अपना सबसे बड़ा काम क्या मानते हैं?

मेरे लिये मेरे सारे काम बड़े हैं क्योंकि सभी कामों में किसी ना किसी का भला हुआ और जहां किसी कि भलाई हो वो काम छोटा हो ही नहीं सकता।

समाज के लिये नयी चुनौतियां क्या हैं?

लोगों का निजी स्वार्थ सबसे बड़ी चुनौती है। उससे भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था और अशांति फैलती है। धार्मिक और जातीय उन्माद द्वारा सबसे ज्यादा असुरक्षा की भावना फैलती जा रही है। हमें समझना होगा कि समाज से देश है और एक मजबूत समाज ही एक मजबूत देश का निर्माण कर सकता है। हमें व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर एक मजबूत देश का निर्माण करना है क्योंकि देश है तो हम हैं।

कैसे समाज का सपना देखते है आप?

भारत में भारतीयता पहली पहचान होनी चाहिये। मैं ये नहीं कह रहा कि कोई भी अपनी जाति या धर्म को भुला दे क्योंकि ये उसकी व्यक्तिगत पहचान है पर इससे ऊपर देश होना चाहिये।

फेम इंडिया के माध्यम से युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे? 

गुरु जी ने हमेशा कहा है कि सफलता के लिये बेचैन मत होइये। यदि आपका लक्ष्य साफ है और आपमें आगे बढ़ने का धैर्य है तो प्रकृति भी आपकी मदद करेगी।