एक लॉबीस्ट की दिनचर्या

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रात के दो बज रहे थे। पूरी दुनिया नींद की आगोश में थी, लेकिन मेरी आंखें सड़क पर जमी थीं और मैं अपने ‘गेस्ट’ के साथ कार की पिछली सीट पर बैठा वापस लौट रहा था उसे वसंत विहार में बने एक वाणिज्य दूतावास के गेस्ट हाउस के दरवाजे तक छोड़ने। जी हां, मेरा  गेस्ट दरअसल मेरा क्लाइंट था और वह एक यूरोपीय देश के वाणिज्य मंत्रालय का अधिकारी था। भारत में बनने वाली एक्स ब्रांड की कारों को युरोप के उस देश एंट्री चाहिये थी और मैं एक कार कंपनी का लायजनिंग एजेंट हूं। मेरा काम किसी तरह उस अधिकारी से रिकॉमेंडेशन लेटर ले लेना था जो उसे हमारी सरकार को देना है। ये लेटर मिलने के बाद ही हमारी सरकार एक्स कार कंपनी को एक्साइज ड्यूटी में छूट देगी और पहली खेप में ही हमारी कंपनी को 250 मिलियन यूरो यानी 1760 करोड़ की राशि मिलेगी और वह गोरा अधिकारी इस बात को अच्छी तरह जानता था।

अपने देश में लोग कहते हैं कि गोरे करप्ट नहीं होते इसीलिये तरक्की करते हैं, लेकिन कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा कि गोरे करप्शन के कारण ही तरक्की करते हैं। दरअसल अपने यहां लायजनिंग का कोई अमाउंट या परसेंटेज फिक्स नहीं है और ये गोरे इसी का फायदा उठा कर अपना हिस्सा वसूलने इतनी दूर इंडिया आ गये। वो मेरे साथ ताज होटल के बार में डेढ़ बजे रात तक दारू पीता रहा और मुझे समझाता रहा कि भारत से कारोबार करने में उसे कितना फायदा है। उसका कहना था कि अगर यही डील युरोप के किसी देश से हुई होती तो कंपनी के लायजनिंग डिपार्टमेंट वाले उसके देश के लायजनिंग फर्म को 0.5 से 1 मिलियन यूरो के बीच लायजनिंग फीस देते और बस कहानी खत्म। वो  फर्म वाले बस एक दो महंगे गिफ्ट देकर नमस्ते कर लेते। भारत में कुछ क्लियर नहीं है और यही कारण है कि यहां की कंपनियों से उसे और उसके बॉस को कम से कम 2 से 4 मिलियन यूरो तक मिलने की उम्मीद है। वह भारत को अपनी पसंदीदा कंट्री मानता है, हालांकि उसे भारत की कंपनियों से बहुत शिकायत है क्योंकि ये डर से युरॉपीय बाजारों का रुख भी नहीं करतीं। “सवा सौ करोड़ की आबादी होने के बावजूद आपके देश से एक भी मोटरसाइकिल कंपनी हमारे बाजार में नहीं आती।” उसने भारी आवाज में कहा था। मैं उसकी बात का जवाब खोज रहा था कि उसने वापस चलने की बात कह दी। मैंने फटाफट होटल का बिल चुकता किया और उसे संभालते हुए पार्किंग की तरफ चल पड़ा। “क्या मोटरसाइकिल यानी टू व्हीलर्स का क्लियरेंस भी आपका ही डिपार्टमेंट देखता है?” मैंने पूछा तो उसने सिर हिलाते हुए बताया कि स्पेयर पार्ट्स भी उसी के जिम्मे है।

मैं मोटरसाइकिलों के बिजनेस का हिसाब ही लगा रहा था कि ड्राइवर ने बताया, वसंत विहार में कॉन्ज्यूलेट का ऑफिस आ गया। मैंने अपने गेस्ट को उतारा और उसे किस तरह ले जाकर दरबान के हवाले किया। फिर हाथ मिला कर कल यानी आज सुबह मिलने का वादा कर वापस आया और ड्राइवर से घर चलने को कहा।  मेरा असल काम तो इस गेस्ट के वापस जाने के बाद शुरु होगा। मेरे बॉस ने बहुत आसानी से कार एक्सपोर्ट में मिलने वाली सब्सिडी अपने देश की फायनैंस मिनिस्ट्री से क्लियर करवायी थी। पूरी इंडस्ट्री को यह खबर थी कि कौन अधिकारी किसके कहने पर कितने की सब्सिडी दे रहा है, लेकिन इन नॉर्म्स पर खरा कौन सी कंपनी उतरेगी यह बात कम लोग ही जानते थे। गोरे ऑफिसर से सौदा होने के बाद मिनिस्ट्री में फाइल सबमिट करना और फिर करोड़ों की सब्सिडी पर ऑफिशियल मुहर लगवाना मेरे ही काम का हिस्सा है। वैसे युरॉप में हर काम के लिये अलग एजेंट होते हैं, लेकिन अपने यहां ऐसा नहीं है। मैं इससे पहले एक पाइप बनाने वाली  फर्म में था। उनके लिये करोड़ों का सरकारी ऑर्डर लाना, उसका पेमेंट करवाना और फाइलों पर सबकुछ साफ दिखाना सबकुछ मेरे जिम्मे था। ये एक ऐसा व्यापार है जिसके बारे में किसी एमबीए इंस्टीच्यूट में नहीं पढ़ाया जाता। कम से कम अपने देश में तो नहीं।

लायजनिंग की पढ़ाई हो भी नहीं सकती। इसके फिक्स्ड रूल नहीं होते। सौदे का हिसाब हर सरकार के मंत्री और अधिकारी के मिजाज के मुताबिक तय होता है। आप एक ही सौदा एक राज्य में केवल गिफ्ट देकर करवा सकते हैं तो उसी सौदे के लिये दूसरे राज्य में बीस पर्सेंट का हिस्सा देना पड़ सकता है। सरकारें अक्सर नेताओं के जिम्मे होती हैं, लेकिन हमें उनकी कार्यशैली का पता अधिकारियों के रवैये से चलता है। अधिकारी हमेशा बदलते रहते हैं और उन्हीं के साथ बदलते रहती हैं सौदों की शर्तें भी। मुझे हमेशा एक नये सौदे के लिये अधिकारी, क्लर्क और नेता या मंत्री के निजी स्टाफ की सूची तैयार करनी पड़ती है। फाइलों की या टेंडर की गुणवत्ता यही अधिकारी तय करते हैं। उन कामों की फेहरिस्त बनानी होती थी, जो उस दिन निबटाने जरुरी हों। किस मंत्रालय में कौन सी फाइल घूमनी है, किस विरोधी उद्योगपति समूह के खिलाफ खबरें प्लांट करनी हैं, अफसरशाही में क्या हलचल होनी है, कौन से नए राजनितिक समीकरण बिठाने हैं, जैसे कामों की एक लम्बी सूची। इसके अलावा कौन किसके साथ है और क्यों है, किसका किससे झगडा हुआ और क्यों हुआ। कौन रात को किसके साथ किसके घर पर था आदि-आदि की तमाम जानकारियाँ जुटाने या जांचने का जिम्मा। कुल मिला कर हमें हर बात की खबर चाहिये। खबर पहले से हो तो भी और पक्का करने की या कुछ ऐसा ढूँढने के लिये हम संवाद सूत्र रखते हैं जो ये बता सकें कि मेरी नज़रों में क्या नहीं आ पाया।

यहीं से हमारा का काम शुरू होता है। हमारी भी रिपोर्टिंग होती है। सौदा हासिल करना और उसे अंजाम तक पहुंचाना एक टीमवर्क होता है। ब्लैक एंड व्हाइट का मिला-जुला रूप। कितने काम ब्लैक में होंगे और कितने व्हाइट में इसका फैसला हमेशा बॉस ही करते हैं। उन्हें सबकुछ बताना होता है, हरेक ऑफिसर का मिजाज और उसके कच्चे चिट्ठे की जानकारी भी। वैसे अक्सर मुझे लगता है कि मैंने जो जानकारी दी वह बॉस के पास पहले से होती है। मानों वह मुझसे केवल वेरीफाई करवाते हैं।

खैर, मैं घर वापस आने के बाद मुश्किल से तीन-चार घंटे ही सो पाउंगा। मुझे अगले दिन कहां, कितने बजे, किसके पास और किसके साथ पहुंचना है यह आज ही तय कर चुका हूं। मेरी सुबह की पहली मीटिंग साढ़े नौ बजे है और उसके लिये मुझे नौ बजे अपने घर से चल ही देना होगा। मैंने दो शिफ्टों के लिये अलग-अलग ड्राइवर रखे हुए हैं, लेकिन खुद को तो नहीं बांट सकता।

मैंने सुबह उठते ही सभी साथियों और संवाद सूत्रों को फोन खड़काना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में अपने नीचे काम कर रहे लगभग दर्जन भर लोगों की फ़ौज को आज का काम बाँट डाला। इस टीम में ज्यादातर वैसे थे जिन्हें मेरी कॉल ने ही नींद से जबरदस्ती उठाया था। इस धंधे में फुर्सत से सोने का समय निकाल पाना सबके लिए उस काम से ज्यादा मुश्किल था, जो उनका रोजाना का रूटीन था। अब मैं तसल्ली से सुबह की सिगरेट के कश लगाते हुए बाथरुम की ओर बढ़ गया। यह पहली ही मेरी पसंदीदा सिगरेट थी क्योंकि इसके बाद तो दिन भर मारामारी ही रहती थी। मैं खुद शराब नहीं पीता, साथ देने के लिये भी नहीं। लेकिन खुमारी में जरूर रहता हूं। शायद काम की और नींद पूरी न हो पाने की।

मेरे काम का समय आम आदमी या ऑफिसों से काफी पहले शुरू हो जाता है। साढ़े आठ बजे तक हर हालत में घर से बाहर। राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके आरके पुरम में एक आलीशान फ्लैट मेरा परमानेंट ठिकाना है। ऐसी बढ़िया लोकेशन, जहां से किसी भी मंत्री या अफसर के घर मुश्किल से 15 मिनट में पहुंचा जा सके। जो सौदे घरों में तय ना हो सकते हों, उनके लिए पास ही मौजूद क्लैरिजेज, शंगरी-ला या लॅ-मेरीडियन होटल एकदम उपयुक्त हैं। दिल्ली गोल्फ क्लब, दिल्ली जिमखाना और फ्लाइंग क्लब भी ज्यादा दूर नहीं हैं। यह सारे अड्डे तमाम तरह के सौदों के गवाह रहे हैं।

आज मेरा मिशन उस गोरे के लिये युरॉप के बैंक में कम से कम 1 मिलियन यूरो जमा करवाना था। मोदी सरकार की नोटबंदी के बाद से हवाला में पैसा बेजना खासा मुश्किल हो गया है। हालांकि हमारी डिक्शनरी में नामुमकिन शब्द नहीं होता, लेकिन व्हाइट में इतने पैसे विदेशी खाते में कैसे जमा होंगे इसके लिये एक मंडी विशेषज्ञ से मुलाकात थी।  इन दलालों से काम करवाना हमेशा मुश्किल रहता है। ये हमेशा टू द पॉइंट बात करते हैं और फीस में सौदेबाजी की गुंजाइश नहीं छोड़ते। नेताओं से काम करवाना अपेक्षाकृत आसान रहता है। मुझे याद है जब इस्पात एक्सपोर्ट के नाम पर यही सब्सिडी हासिल करने की बात थी तब कैसे मैंने अपनी टीम से 30 सांसदों से हस्ताक्षर जुटवाये थे। इस मसले पर मीडिया, बिज़नेस,राजनीतिक जगत और अन्य कई संगठनों में मौजूद हमारे विरोधी खूब हल्ला मचा रहे थे। हमें इस सब्सिडी को देश हित में हुआ फैसला साबित करने के लिये सभी राजनीतिक पार्टियों का साथ चाहिए था। देश की विभिन्न पार्टियों से 60 सांसदों के सिग्नेचर की जरुरत थी। 30 साइन  हासिल हो  चुके थे और पक्के लिखित समर्थन के लिए बाकी 30 के हस्ताक्षर तुरंत-फुरंत में निबटाने थे। मेरे लिये यह बायें हाथ का खेल था, ख़ास तौर से तब जबकि कंपनी हर साइन की मुंहमांगी कीमत चुकाने को तैयार थी।

पार्लियामेंट का सेशन चल रहा था और सारे सांसद दिल्ली में ही मौजूद थे। मैंने छह लड़के-लड़कियों को काम पर लगाया था और आठ नौ घंटे में ही काम ख़त्म हो गया था।  पूरा सौदा बहुत सस्ते में ही निबट गया। ज्यादातर नेता तो छुट्टियों में हवाई या ऑस्ट्रेलिया के फुल पेड टूर पर ही मान गये। एक-दो के बच्चों की अमरीका या युरॉप में स्पॉन्सर्ड पढ़ाई, एक के घर में होने वाली एक शादी की जिम्मेदारी, और दो-चार नेताओं को मिलने वाले खर्चे में बढ़ोतरी। सब कुछ बहुत आसानी से फोन और व्हाट्सएप्प के जरिये हाथोंहाथ फाइनल  हो गया। असली डिजिटल क्रांति तो इन सौदों में ही सामने आती है। पूरा देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। टेक्नोलॉजी ने ऐसे जरुरतमंदों का काम बहुत आसान कर दिया है।

आज का काम दोपहर एक बजे तक निबट गया। हमारे गेस्ट को उसकी खबर भी मिल गयी। ये गोरे वाकई हमसे ज्यादा समझदार होते हैं। उसने अपने अकाउंट में एक रुपया नहीं डलवाया। कुछ पैसा अपने ससुर के नाम और कुछ अपने दूर के रिश्तेदार के नाम पर जमा करवाया जिसके बैंक का कार्ड वही इस्तेमाल करता है। दो बजे उससे  लेटर लेने जाना है। फिर फाइलों को आगे बढ़वाना, जरुरत के हिसाब से नीतियों को तोड़ना-मरोड़ना या फिर बदलवा ही देना, जरुरत हो तो अफसरों के दिमाग में ‘नया’ यानी अपने मतलब का आईडिया डालना। हर मर्ज़ का इलाज है मेरे पास। विरोधियों के राज़ जानना हो या फिर अन्दर की बातें निकलवाना। कीमत मिलती रहे तो चुकाने वालों की किस्मत रातों-रात पलटवा सकता है हमारा छोटा सा नेटवर्क।