लॉबिंग का बढ़ता साम्राज्य

 

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सत्ता, चेहरे और सन्दर्भ भले ही बदलते रहें पर आम धारणा यही बनायी गयी कि मध्यस्थ, एजेंट , लॉबिस्ट या लाइजनर हमेशा से ही आम जनता के हितों के विरुद्ध रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि वे समाज का ऐसा अभिन्न हिस्सा हैं जिनके बिना बहुत कुछ कभी सुचारू रूप से नहीं चल सकता। बताया जाता है कि ये लॉबिस्ट हमेशा ही कॉर्पोरेट और औधोगिक घरानों को फायदा पहुंचाते आये हैं। यह भी कहा जाता है कि ये पैसे और ग्लैमर को हथियार बना कर देश की नीतियाँ तय करने वालों को अपने जाल में फंसा लेते हैं और अपने इशारों पर नचाने में माहिर होते हैं, लेकिन वास्तव में इन लॉबिस्ट के बिना व्यापार तो क्या किसी सरकार के भी सौदे का एक पैसा इधर से उधर नहीं जाता। एक बेहद सुचारू नेटवर्क बना कर ये मध्यस्थ बड़े से बड़े नीतिगत फैसलों को एक झटके में बदलवाने की महारत रखते हैं।

इस समय भी भारत में ऐसे कई बड़े लॉबिस्ट या लाइजनर सक्रिय हैं। अपने काम को ऐसे लोग भले ही पीआर, कनेक्टिंग, हेल्प या रिलेशन मेकिंग जैसे किसी भी नाम से पुकारें पर उसका मकसद सिर्फ एक होता है- लॉबिंग करके अपने क्लाइंट्स को फायदा पहुंचाना। इनके चेहरों से आम जनता भले ही अनजान रहती हो पर सत्ता के गलियारों में यह हर जगह अपनी उपस्थिति का एहसास कराते हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर के लगभग सभी देशों में इनका नेटवर्क बहुत व्यवस्थित है। कहीं स्पष्ट रूप से मौजूद है तो कहीं दिखाई भी न दे, पर ये नेटवर्क काफी सक्षम तरीके से अपने काम को अंजाम देता रहता है।  कई यूरोपीय देशों में तो लॉबिंग करने वाली कई नामी-गिरामी  कंपनियां हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों या उद्योगों में अलग-अलग भूमिका निभा रही हैं। यहाँ तक कि देशों के चुनाव भी इनसे अछूते नहीं रहे हैं।

हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यु की एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका की सबसे बड़े लॉबिंग ग्रुप ‘चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स’ ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक कानून को प्रभावित करने के लिये नौ करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च किये हैं। पिछले कुछ वर्षों के बीच अमरीका की लॉबिंग कंपनियों ने इसी को बदलवाने पर अपना ज्यादातर समय खर्च किया है। लॉबिंग करने वाली ये कंपनियां कितनी ताकतवर होती हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि अपनी अमरीकी संसद तमाम कोशिशों के बावजूद जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रावधानों का  बिल सीनेट में पेश करने में नाकाम रही।  तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के ख़ास ध्यान देने और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स द्वारा 2009 में ही पास किये जाने के बावजूद अमेरिकन क्लीन एनर्जी एंड सिक्योरिटी ऐक्ट आगे पेश नहीं किया जा सका। इसी तरह अरबों डॉलर के कारोबार वाले मीट या मांस का व्यापार करने वालों की लॉबी इतनी मजबूत है कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में प्रोसेस्ड मीट को तंबाकू से भी खतरनाक कैंसर एजेंट बताये जाने के बावजूद उसके प्रचार पर रोक नहीं लगने दी।

अमरीका के हाल के राष्ट्रपति चुनावों में भी लॉबिंग का बोलबाला रहा। डोनाल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन को जिताने के लिये उनके सम्बंधित पक्षों ने जम कर लॉबिंग की। पैसा पानी की तरह बहाया गया ताकि अपने उमीदवार को जीता कर अपने स्वार्थ सिद्ध कर सकें।  लॉबिंग कंपनियां यह काम डोनेशन की आड़ में भी पैसा मुहैया करा कर करती हैं। कई रिपब्लिकन सीनेटरों पर लॉबिंग के आरोप लगे और आखिरकार पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

भारत में लॉबिंग को मान्यता प्राप्त नहीं है पर यहाँ भी यह लम्बे समय से मौजूद है। हाँ, इसके तरीके एकदम अलग हैं। सच तो यह है कि रक्षा सौदों में इनका दशकों से बोल-बाला रहा है।  शुरुआती किस्सों पर नज़र डालें तो 1971 के भारत-पकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना के अध्यक्ष एडमिरल एस एम नंदा और उनके बिज़नेसमैन बेटे सुरेश नंदा ऐसे ही सौदे में फंसने के कारण सुर्खियों में रहे हैं। उनके अलावा 87 साल के एक अप्रवासी भारतीय विपिन खन्ना पर तो ब्राज़ील से तीन हवाई जहाज खरीदने के मामले में लगभग 58 लाख डॉलर की किकबैक लेने के मामले में केस भी दर्ज हुआ। उनका नाम और रक्षा सौदों में भी आया पर आयल फॉर फ़ूड उनके चर्चित स्कैन्डलों में से रहा। इसके बाद तो बोफोर्स से लेकर अब तक के ज्यादातर रक्षा सौदों पर सवालिया निशान लगते ही रहे हैं। सिलसिला अभी भी थमा नहीं है।

हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी इसका प्रचलन बढ़ा है। कई अन्य मन्त्रालय भी इसकी जद में आ गये हैं। विडंबना यह है कि भारत के मंत्री या अधिकारी मध्यस्थों या उनकी फर्मों की सेवायें तो लेते हैं, लेकिन कानूनन उनसे दूर रहने का स्वांग करना पड़ता है। अब तो कई औद्योगिक घराने मंत्रालयों और अफसरशाही से अपने काम निकलवाने के लिये इन मध्यस्थों का सहारा ले रहे हैं।

सत्ता से इनके संबंधों का फायदा उठाने के लिये वो उन्हें कीमत के तौर पर मोटी फीस चुकाते हैं। भारत में अगर किसी मध्यस्थ का नाम सामने भी आता है तो किसी घोटालेबाज या दलाल के तौर पर ही। ऐसा ही एक नाम 2 जी घोटाले के दौरान सुर्ख़ियों  में आया था। नीरा राडिया का। सिर्फ दस वर्षों के छोटे से अंतराल में उन्होंने 300 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लिया। ग्लैमर, नेटवर्किंग और लॉबिंग क्षमता में महारत हासिल कर चुकी राडिया की सफलता का सबसे बड़ा राज़ रहा कि उनकी जान-पहचान सभी क्षेत्रों में बराबर की थी। कॉर्पोरेट हाउस, अफसरशाही और नेताओं ही नहीं बल्कि मीडिया में भी गहरी पकड़ ने उनका रास्ता काफी आसान किया।

दरअसल इस ‘उद्योग’ की भारत में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसे कानूनी दर्जा हासिल नहीं है, जबकि कई यूरोपीय देशों में इसे उद्योग का दर्जा हासिल है। यही वजह है कि जिसे भी मौका और जुगाड़ उपलब्ध हो, वो भारत में मध्यस्थता  के काम में हाथ आजमाने लगता है। यह कोई भी  हो सकता है। हमारा-आपका पडोसी, रिपोर्टर, एडीटर, वकील, टेक्नोक्रैट, रिटायर्ड अफसरशाही, प्रॉपर्टी डीलर या फिर छोटे-मंझोले बिजनेसमैन भी।। कई जाने-माने चेहरों ने तो अपनी पब्लिक रिलेशन कंपनियां भी खोल रखी हैं, जो मोटे तौर पर इसी मध्यस्थता के काम में लगी हैं। पब्लिक रिलेशन एक तरह से मान्यता प्राप्त है और जन-संपर्क के नाम पर सरकारें भी इन्हें हायर कर सकती हैं।

नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने या उसका फायदा उठाने के लिये पत्रकारों, नेताओं, मीडिया और कानून के यह चिर परिचित नाम साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लेकर काम निकलवाने में माहिर हैं। यह इसलिये भी बेख़ौफ़ अपने काम को अंजाम देते हैं क्योंकि भारत में यह काम कानून के दायरे में नहीं है। इस मामले में स्पष्ट कानून या दिशानिर्देशों के अभाव में किसी सजा आदि का भी प्रावधान नहीं है। संगठित उद्योग न होने के बावजूद यह धंधा बिना परेशानी के फल-फूल रहा है। सत्ता के गलियारों में यह बेरोकटोक और बेखौफ घूमते हैं।

क्योंकि भारत में इस उद्योग से जुड़े कुछ लोगों को इसी बहाने दुनिया भर में फैली कई लॉबिंग फर्में इस काम के लिये गैर सरकारी संगठनों का इस्तेमाल भी आजकल धड़ल्ले से कर रही हैं। हालात इस कदर प्रभावित हैं कि यूरोपीय यूनियन ने हाल में कई विश्व प्रसिद्ध लॉबिंग फर्मों और गैर सरकारी संगठनों से उनके स्टाफ की सूचियाँ मांगी हैं, जिनका नाम लॉबिंग के सिलसिले में कभी भी उछला हो।

पिछले कुछ सालों में लॉबिंग पर सबसे ज्यादा खर्चा तम्बाकू और मीट उद्योग ने किया है। केवल यूरोपीय यूनियन में ही पिछले साल की तुलना में पांच गुना ज्यादा पैसा खर्च किया गया। यूरोपियन पार्लियामेंट में तम्बाकू उत्पादों पर संशोधित दिशा निर्देशों की बहस को प्रभावित करने के लिये डॉलरों की नदियाँ बहा दी गयी। सच तो यह है कि तम्बाकू उद्योग इस समय अपना रुतबा कायम रखने के लिये सभी देशों में बेतहाशा पैसे खर्च कर रहा है। भारत में भी इन दिनों जगह-जगह तम्बाकू किसानों के होर्डिंग नजर आ रहे हैं जिनमें तम्बाकू को बैन करने से पहले उनकी बदहाली पर ध्यान देने की अपील की गयी है। कुछ दशक पहले तक लॉबिंग के लिये चीनी उद्योग को जाना जाता था

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि भारत में भले ही मधयस्थता का यह कारोबार खुल कर न होता हो पर पैर तो मजबूत कर ही चुका है। लोग खुलेआम मध्यस्थ कहलाये जाने से हिचकते हों पर पैसा कमाने का यह जरिया स्टेटस सिंबल बनने में भी मददगार है ही,जो रातोरात शोहरत और प्रसिद्धि के उस मुकाम तक भी पहुंचा देता है, जहां से दुनिया अपनी मुट्ठी में होने का आभास होता है।पर थोड़ी सी भी गलती बहुत भारी पड़ सकती है लेकिन आसमान छूने की इंसान की आकांक्षा तो उसे हमेशा से ही चुनौती देती रही है