अंडमान को बनाना है इंटरनैशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशन – प्रो. जगदीश मुखी

प्रो. जगदीश मुखी देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में से हैं जिन्हें उनकी राजनीति से ज्यादा विकासवादी सोच और योजनाओं के लिये जाना जाता है। भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक डॉ. मुखी एक अरसे से दिल्ली की राजनीति में बहुचर्चित नाम हैं। वे एक शिक्षक कानूनविद और लेखक भी रह चुके हैं। उन्होंने ‘कंपनी लॉ एंड सेक्रेटैरियल प्रैक्टिस’ नाम की किताब भी लिखी है जिसे कंपनी सेक्रेटरी के कोर्स में पढ़ाया जाता है।
कम लोगों को पता है कि दक्षिण दिल्ली में 1999 के जिस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के स्टार नेता मनमोहन सिंह को प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा के मुकाबले मुंह की खानी पड़ी थी, उसके रणनीतिकार डॉ. मुखी ही थे। बतौर वित्तमंत्री दिल्ली में लॉटरी बंद करवाने का ऐतिहासिक फैसला लेने और सख्ती से लागू करवाने वाले डॉ. मुखी को देश के सर्वश्रेष्ठ वित्तमंत्री और दो बार दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ विधायक का खिताब भी मिल चुका है। इसी विकासवादी छवि और सोच का सम्मान करते हुए डॉ. जगदीश मुखी को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाया गया है। फेम इंडिया ने उनसे उनके व्यक्तित्व और भावी योजनाओं पर बातचीत की। एक झलक

आप शिक्षक से राजनेता और फिर प्रशासक बने, कैसा महसूस हो रहा है?
भाजपा ने मुझ पर भरोसा जताया और नयी जिम्मेदारी दी है। मैं पूरी तरह इसे निभा रहा हूं और इतने कम समय में ही अंडमान-निकोबार के लोगों ने मेरे कार्यों में बढ़-चढ़ कर सहयोग दिया है।

अपने बारे में कुछ बतायें।
मेरा जन्म डेरा गाज़ी खान के दजल में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। मेरे पिता स्व. राम मुखी किसान थे और स्वतंत्रता-प्राप्ति पर हुए देश-विभाजन के वक्त हमें भारत आना पड़ा। हमलोग हरियाणा के सोहना में बस गये। मेरी मां लक्षी देवी एक गृहणी थीं और बेहद शालीन व्यक्तित्व की थीं। मेरी पत्नी प्रेम समाज सेवा में है और महिला जागृति संघ से जुड़ी हैं।

आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई
मैंने सोहना के सरकारी स्कूल से ही मैट्रिक तक की शिक्षा ली और फिर बी कॉम की पढ़ाई के लिये अलवर के राज ऋषि कॉलेज में ऐडमिशन लिया। मैं कॉलेज के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था और कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ा व जीता था। मैं अर्थशास्त्र, खासकर कॉमर्स का तेज छात्र था इसलिये पोस्ट ग्रैजुएशन के लिये दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला मिल गया जहां काफी कुछ सीखा।

आपने दिल्ली को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाने के विषय में कब सोचा?
यह किसी सोच के तहत नहीं हुआ। मुझे पहले रिजर्व बैंक में ट्रेनी ऑफिसर की, फिर करीब साल भर बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गयी। शुरू से ही इस सोच का था कि अन्याय बर्दाश्त नहीं कर सकता था। मैंने देखा कि सरकार शिक्षकों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही थी। उन्हीं दिनों मेरे सहयोगी डॉ. ओम प्रकाश कोहली जी भी मिले जो आजकल गुजरात के राज्यपाल हैं। हमने डूटा के जरिये शिक्षकों की आवाज बुलंद की तो सरकार को काफी कुछ करना पड़ा। जब नौकरी दिल्ली में हुई तो रहना भी यहीं हुआ। धीरे-धीरे इस महानगर से जुड़ता चला गया।

दिल्ली की राजनीति की कुछ यादें?
देश में जब आपात-काल लागू हुआ तो मुझे राजनीति में सक्रिय होना पड़ा। हमने कई आंदोलन किये। लोगों को जागरुक किया। 1980 से दिल्ली के स्थानीय निकाय के चुनावों में शामिल हुआ और तब से लगातार सात बार जीत चुका हूं। जब 1993 में दिल्ली विधानसभा का गठन हुआ तो मुझे वित्त मंत्रालय का जिम्मा दिया गया। मैंने कई महत्वपूर्ण सुधार लागू करवाये जो अब तक कायम हैं। लॉटरी जैसी सामजिक बुराई को दिल्ली से उखाड़ने पर मुझे आज भी गर्व है। इसके अलावा शराब का प्रचलन कम हो इसके लिये ड्राई डे को बढ़ा कर काफी नियंत्रण लगाया था। बाद में अगली सरकार में मैं नेता-प्रतिपक्ष भी रहा।

आप सुधारवादी राजनेता माने जाते हैं। अडमान-निकोबार का भविष्य कैसे संवारेंगे?
मैंने कई सुधारों को शुरू भी करवा दिया है। अंडमान की जनसंख्या 4 लाख है और लगभग इतनी ही संख्या यहां आने वाले पर्यटकों की है। मैंने सबसे पहले यहां आने और यहां आने पर ठहरने-घूमने में हो रही परेशानियों को दूर करने की कोशिश की। यहां आने-जाने का किराया काफी महंगा था जिसे कम करवाने की दिशा में पहल की। फिर यहां की सुविधाओं को दुरुस्त किया।

आपके इन प्रयासों के परिणाम कब तक सामने आयेंगे?
आप यकीन नहीं करेंगे, इन पांच महीनों में ही बेहद उत्साहजनक परिणाम सामने आये हैं। पर्यटकों की संख्या में 38 फीसदी का इजाफा हुआ है। लोग यहां आने पर शिकायत नहीं कर रहे, बल्कि हमारे इंतजामों की तारीफ कर रहे हैं। लेकिन हमारा लक्ष्य कहीं आगे है। अंडमान-निकोबार में एक अंतर्राष्ट्रीय टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनने की असीम संभावनाएं हैं। यहां का नीला पानी और शांत समुद्र किसी भी मायने में मॉरीशस, मालदीव, मलेशिया या सेशल्स से कम नहीं है। उसके बारे में लोगों को बताने की जरूरत है। हमारा लक्ष्य हर साल कम से कम दस लाख पर्यटकों को आकर्षित करने का है।

लेकिन विदेशी पर्यटकों के बहुतायत में आने से यहां की संस्कृति पर कोई खतरा तो नहीं आयेगा?
हम इस बात का पूरा खयाल रखेंगे कि जो स्थानीय प्रजातियों और कबीलों के लोग हैं उन्हें कोई परेशानी न हो। प्रशासन को दुरुस्त और लचीला बनाया जा रहा है। मैंने दिल्ली में भी शराब के प्रचलन को रोकने के लिये ड्राई डे को बढ़ाने का प्रयोग किया था जो काफी कारगर रहा था। यहां भी वैसी ही शुरुआत कर चुका हूं। तंबाकू वाले पान-मसाले यानी गुटके पर रोक लगाने का भी खासा स्वागत हुआ है। सेल्युलर जेल से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की यादें जुड़ी हैं। कम लोगों को पता है कि भारत को आजादी मिलने से बहुत पहले नेताजी ने पहली बार यहां 30 दिसंबर 1943 को ही तिरंगा झंडा फहरा दिया था। हमने इसे खूब प्रचारित-प्रसारित किया है और 30 दिसंबर को उस ऐतिहासिक दिन की यादगार के तौर पर मनाने का कार्यक्रम भी शुरु करवाया। लोगों में इसे लेकर काफी उत्साह है। मैंने गुटके को प्रतिबंधित कर दिया जिसका समाज के हर वर्ग ने स्वागत किया है।

और क्या-क्या सुधार करने हैं?
अंडमान-निकोबार की कई स्थानीय समस्याएं हैं जिनपर ध्यान देने की आवश्यकता है। एक तो यहां बिजली बनाने में डीजल का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है जो पर्यावरण और संपत्ति दोनों के लिहाज से बहुत नुकसानदेह है। मेरा प्रयास है कि अधिक से अधिक सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल हो। दूसरी समस्या उच्च शिक्षा की है। यहां इतने वर्षों में किसी भी विश्वविद्यालय की शुरुआत नहीं हुई थी। उच्च शिक्षा की डिग्री लेने के लिये छात्रों को कोलकाता या चेन्नई जाना पड़ता है। मैं एक शिक्षाविद रह चुका हूं, इसीलिये मेरी प्राथमिकता यहां कोई विश्वविद्यालय खुलवाने की है। इस बारे में यूजीसी और केंद्र सरकार से भी बात चल रही है। यहां स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार की आवश्यकता है। हार्ट, न्यूरोलॉजी या नेफ्रोलॉजी के कई बड़े ऑपरेशन यहां नहीं हो पाते, उनकी व्यवस्था करने की जरूरत है। स्पोर्ट्स में अंडमान-निकोबार का भी नाम हो ऐसा माहौल तैयार करना है। अंडमान-निकोबार में परिवहन की समस्या भी बहुत बड़ी है। मेरी कोशिश है कि रेलवे यहां भी अपने ऑपरेशंस शुरु करे। इस दिशा में केंद्र सरकार और विभिन्न एजेंसियों से बातचीत भी जारी है।

फेम इंडिया के जरिये कोई संदेश देना चाहेंगे?
आने वाली पीढ़ी से एक बात अवश्य कहना चाहूंगा कि वह खुद पर विश्वास कर के कोई भी काम करे। स्वामी विवेकानंद जी ने भी कहा था कि जबतक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तबतक आप पर भगवान भी विश्वास नहीं कर सकते।