मास्साब का पर्चा

छुट्टियां खत्म हो गयी हैं और स्कूल दोबारा शुरू हो गये हैं। अभी स्कूल आया तो पता चला कि मुझे चार कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना है। एक साथी टीचर जन शिक्षा केन्द्र में रिपोर्ट बनाने में व्यस्त हैं। उन्हें हर दूसरे दिन डाक लेकर जाना पड़ता है। कहने को तो जन शिक्षा केन्द्र में प्रभारी की व्यवस्था है, लेकिन वहाँ प्रभारी का काम भी किसी प्रभारी के भरोसे चल रहा है। एक शिक्षक पूरे महीने तमाम काम करने में जुटा रहता है।

जब मेरा सेलेक्शन अध्यापक पद के लिये हुआ था तब मन में उमंगों के फूल खिलने लगे थे। मैं खुद एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हूं और हमेशा इस बात का मलाल रहता था कि क्लास में कोई टीचर पढ़ाने क्यों नहीं आता। मैंने सोचा था कि मैं जब स्कूल में जाउंगा तो सारी व्यवस्था बदल कर बच्चों को पूरे मन से पढ़ाउंगा, लेकिन नौकरी मिलते ही उस पर स्टे लग गया। अदालत ने उस साल हुई सारी नियुक्तियों पर जांच बिठा दी और कई सालों की लड़ाई के बाद नौकरी हासिल हुई। नौकरी मिली तो अध्यापक संघ ने कहा हमारी तनख्वाह पुराने वेतनमान पर आधारित है, हड़ताल करना होगा। खैर, कुछ महीनों बाद ही सरकार ने हमारी समस्याओं को सुना और पूरा किया, लेकिन सरकारी कामकाज का तो पता ही है। अधिकारियों के ढीले रवैये के कारण वे आदेश अभी तक नहीं मिले हैं। मेरा प्रमोशन होना है, लेकिन सरकारी आदेश के बावजूद नहीं हो रहा है। सीईओ के पास जाता हूँ तो वे डीईओ के पास भेज देते हैं। डीईओ के पास जाता हूँ तो वे कहते हैं ऊपर से गाइडलाइन्स माँगे गये हैं।

बिटिया स्कूल जाने लगी है। अपने स्कूल में तो पढ़ाई भगवान भरोसे है, सो मैंने उसे पास के ही एक प्राइवेट स्कूल में भर्ती करा दिया है। फीस बहुत ज्यादा है, लेकिन मैंने कुछ जान-पहचान निकाल कर डिस्काउंट करवा लिया है। घर के पास है तो लाने-ले जाने का खर्चा भी बच जाता है। कल पुराना दोस्त निरंजन मिल गया था। पढ़ने में मुझसे तेज था, लेकिन पिता की दुकान संभाल रहा है, आज ठाठ में बेशक मुझसे आगे है,लेकिन आराम जरा भी नहीं। अभी मेरा वेतन 28 हजार रुपये है, करीब दस हजार एक घंटा ट्यूशन करके कमा लेता हूं। कुछ इधर-उधर पैसे भी लगा रखे हैं।

आज प्रधानाध्यापक ने नया आदेश दिया है। समग्र स्वच्छता अभियान में काम करने जाना है। अभी-अभी जनगणना की ड्यूटी खत्म हुई है। जो चाहे वहाँ काम पर लगा देता है। पिछली बार मेरी जनगणना में ड्यूटी थी कि भोपाल के एक साहब दौरे पर आ गए। गाँव वालों ने शिकायत कर दी कि मास्साब नहीं आते हैं। फिर क्या, मुझे सस्पेंड कर दिया। मैंने कलेक्टर साहब का आदेश दिखाया। तब कहीं जाकर मुझे न्याय मिला। लेकिन तब तक मुझे जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में दर्जनों चक्कर लगाना पड़े।

मैं काम पर लौट आया। लेकिन इस बीच स्वतंत्रता दिवस आ गया। बिटिया की ड्रेस नहीं आयी अब तक। बार-बार जिद कर रही थी तो मैंने एक तमाचा जड़ दिया। कितना रोई थी वह। मुझे भी बहुत बुरा लगा। पहली बार मारा था। क्या करूँ हालात बिगड़ जाते हैं तो कभी-कभी गुस्सा आ जाता है। फाइलों में उलझ कर चार महीनों की सैलरी बैंक में नहीं आयी थी। चार महीनों में मुझे ट्यूशन और ठेकेदारी में लगाये पैसे के रिटर्न से ही गुजारा करना पड़ा। दरअसल स्कूल में कुछ वक्त मिल जाता है इसलिये तकरीबन सभी टीचरों ने कुछ न कुछ साइड बिजनेस डाल रखा है। मैंने थोड़ी देर से शुरुआत की और बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट में से निकाल कर चार लाख रुपये में अपने भाई के नाम पर ठेकेदारी शुरु करवा रखी है। दरअसल ये फर्म हमारे प्रिंसिपल साहब की फर्म के साथ मिल कर काम करती है। उनका भी उनके साले के नाम पर बड़ा काम है। कई बिल्डिंगों के कॉन्ट्रैक्ट लेते हैं, ज्यादातर सरकारी। यदा-कदा तनख्वाह मिलने में परेशानी हो जाती है तो इसी कमाई से गुजारा करना पड़ता है।

मिड डे मील भी कितना बड़ा सिरदर्द है। कोई गलती हो जाये, खाना खराब हो या कीड़ा निकल जाए तो सस्पेंड होगा मास्टर। पिछले साल पास वाले गाँव के एक सर का इनक्रीमेंट रुक चुका है। मैं तो बच्चों को काम देकर मध्याह्न भोजन की व्यवस्था संभालता हूँ। पढ़ाई तो बाद में हो जायेगी। कोई लफड़ा हो गया तो क्या जवाब दूँगा। इससे बढ़िया तो कई स्कूल वाले कर रहे हैं कि मिड डे मील का राशन उठा कर सीधे दुकान में भेज देते हैं। राशन के पैसे भी मिल गये और झंझट से भी मुक्ति मिल गयी।

मन में अक्सर खुद ही सवाल पूछता हूँ पढ़ाई का क्या होगा? गुणवत्ता का क्या हाल रहेगा? लेकिन फिर लगता है कि व्यवस्था ही मुझे बेहतर पढ़ाने नहीं देती तो मैं क्या करूँ? जनशिक्षा केन्द्र गया था, डाक देने। वहाँ प्रमोशन आदेश के बारे में पूछा, लेकिन पता चला कि कोई आदेश नहीं आया है। इधर हाथ तंग है और समस्या हल नहीं हो रही है। बहुत खीज होती है। लौट कर स्कूल आया तो देखा कि दो स्टूडेंट मस्ती से गप-शप कर रहे थे। उत्तर याद करने को दिये थे। दो दिन से पूछ रहा हूँ लेकिन दो उत्तर याद नहीं हुए। दोनों को जमाकर दिए दो-दो चमेट। चुपचाप बैठकर पढ़ाई नहीं कर सकते। समझ नहीं सकते कितना परेशान हूं। बाद में समझाया कि कल याद करके आना। मन बेचैन है इसीलिये कुछ लिखने बैठ गया था।