विवादों से दूर और हर दिल अजीज हैं गुलाम नबी आजाद

गुलाम नबी आजाद की पहचान एक ऐसे राजनेता की है जिसे कांग्रेस के अलपसंख्यक चेहरे और पार्टी के थिंक टैंक के तौर पर जाना जाता है, लेकिन उनके मधुर संबध तकरीबन सभी पार्टियों से हैं. वे एक ऐसा चेहरा हैं जिनकी वजह से पार्टी अपना गठबंधन धर्म सहजता से निभा पाती है.

आजाद ने अपना राजनीतिक कॅरीयर 1973 में बिलकुल निचले स्तर यानी ब्लॉक कांग्रेस से शुरु किया. जल्दी ही 1975 में वे जम्मू कश्मीर यूथ कांग्रेस के और फिर 1980 में ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने. उन्हें संजय गांधी का करीबी माना जाता था और उस जमाने में उनकी तूती बोलती थी.

उसी साल हुए लोक सभा चुनाव में उन्हें पार्टी ने महाराष्ट्र के वाशिम से चुनाव लड़वाया जहां से जीत कर सांसद बने. हालांकि 1980 में ही संजय गांधी की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी, लेकिन गुलाम नबी आजाद एक गंभीर राजनेता के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो चुके थे. उनके सांसद बनने के दो साल बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्र सरकार में बतौर उपमंत्री शामिल कर लिया. 

फिर तो आजाद का सियासी सफर राष्ट्रीय राजनीति पर छाया रहा और वे कई बार लोकसभा व राज्यसभा के जरिये संसद की शोभा बढ़ाते रहे. वे 1984  में दोबारा वाशिम से ही जीते और केंद्रीय राज्य मंत्री बने. नरसिंहाराव सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री भी बने.

2005 में उन्हें जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ. वे इससे पहले मनमोहन सिंह की यूपीए सरकारों में संसदीय कार्य मंत्री और फिर बाद में स्वास्थ्य मंत्री भी बने. 2015 में जम्मू-कश्मीर से राज्यसभा सदस्य बने.  

सरल और सरस स्वभाव के आजाद की छवि एक विवाद रहित धर्म-निरपेक्ष मुस्लिम नेता की रही है. जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री रहते हुए वे राजनीतिक मुद्दों पर गंभीर और सटीक टिप्पणी करते हैं. वे राहुल गांधी के विश्वस्त और अनुभवी सलाहकारों में से हैं जो उन्हें राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर महत्त्वपूर्ण सलाह देते हैं. 

व्यक्तित्व, रणनीतिक समझ, जिम्मेदारी, पार्टी में प्रभाव, छवि और राजनीतिक दखल आदि मानकों को ध्यान में रख कर किये गये देशव्यापी सर्वे में गुलाम नबी आजाद को धाकड़ नेताओं में अहम स्थान प्राप्त हुआ है.