फैल रहा है मायाजाल…

सरकारी बदहाल, तो प्राइवेट मालामाल

किसी भी देश के विकास की पहली शर्त है वहां के नागरिकों का शिक्षित होना। विचारधारा कोई भी हो- कट्टर-वादी, उदार-वादी, नियो उदार-वादी, साम्य-वादी, समाज-वादी या फिर गांधी-वादी, सब इस एक मुद्दे पर एकमत हैं। शिक्षा कैसी हो, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन सभी इतना जरूर मानते हैं कि शिक्षा समाज का एक अहम अंग है। आधुनिक भारत के निर्माताओं ने यह सपना देखा था कि देश का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी उम्र का हो, शिक्षित हो। हमारे संविधान निर्माताओं ने नीति निर्देशक तत्वों में यह लक्ष्य रखा था कि, “सरकार देश के सारे बच्चों के लिए 14 वर्ष की उम्र तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था दस वर्ष के अंदर करने का उद्यम करेगी।” संविधान लागू करने के दस वर्षों के अंदर देश के सारे बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन अफसोस कि जो काम दस वर्ष के अंदर हो जाना चाहिये था, वह 70 सालों में भी व्यवहारिक रूप से धरातल पर लागू नहीं हो पाया और न ही निकट भविष्य में इसकी कोई उम्मीद दिख रही है। शायद सरकारों में बैठे लोग नहीं चाहते कि देश के सारे बच्चे भली-भांति शिक्षित हों।

जब साठ के दशक में सरकार को समझ में आ गया कि सबके लिये शिक्षा उतनी आसान नहीं है तो स्कूलों में सुधार के लिये कोठारी आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने ‘पड़ोसी स्कूल प्रणाली’ की सिफारिश की, जिसमें कहा गया कि सारे बच्चे अनिवार्य रूप से अपने पड़ोस के ही स्कूल में पढ़ने जायेंगे। आयोग ने समान स्कूल प्रणाली में हर स्कूल का एक भौगोलिक दायरा या क्षेत्र निश्चित करने, और सारे बच्चों को शिक्षित करना सरकार की जिम्मेदारी मानने की बात की थी। यह भी कहा था कि उस क्षेत्र में दूसरा स्कूल नहीं होगा। ढेर सारे सरकारी स्कूल खोलने की भी सिफारिश की गयी और जहां सरकारी स्कूल नहीं हैं वहां निजी स्कूलों के जरिये शिक्षा फैलाने की बात की गयी।

भारत में शिक्षा की राह में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया राइट टू एजुकेशन यानी ‘आरटीई’ ऐक्ट। हालांकि यह संविधान लागू होने के करीब 60 वर्षों बाद यानी 2009 में आया, लेकिन इसके बाद से हमारे देश ने शिक्षा में बहुत प्रगति की है। गांव-गांव में स्कूल खुल गये। आंकड़ों की मानें तो 90 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाने लगे हैं, साक्षरता का स्तर बहुत बढ़ गया है। उच्च शिक्षा में भी काफी प्रगति हुई है। कई नये विश्वविद्यालय, ढेर सारे इंजीनियरिंग कॉलेज, मुक्त विश्वविद्यालय आदि अब मौजूद हैं, जिससे आगे बढ़ने के कई अवसर खुल गये हैं। सूचना-तकनालॉजी यानी आईटी के मामले में तो हम नंबर एक पर पहुंच गये हैं। क्या इसे शिक्षा के क्षेत्र प्रगति नहीं मानते?

प्रगति तो हुई है, लेकिन बहुतों का मानना है कि यह नाकाफी, खोखली और दिखावटी है। स्कूल तो गांव-गांव, बस्ती-बस्ती में खुल गये हैं, लेकिन उनमें से बहुतों में पढ़ाई नहीं होती। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक है। जहां ज्यादा शिक्षक हैं, वहाँ भी एक या दो किसी न किसी कारण से गैरहाजिर रहते हैं। इनमें से ज्यादातर गैर प्रशिक्षित व अस्थायी भी हैं। हर कोई आंकड़ों से खेल रहा है। स्कूलों में बच्चों की दर्ज संख्या कुछ हद तक दिखावटी और आंकड़े बढ़ाने के लिये ही हैं। वास्तव में उससे काफी कम बच्चे स्कूलों में मिलते हैं। पिछडे़ इलाकों में शिक्षा की हालत ज्यादा खराब है। गांव में, लड़कियों में, दलितों में, आदिवासियों में अभी भी एक बड़ी संख्या स्कूल नहीं जाती है। जो जाते हैं, उनमें भी काफी बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं।

संवैधानिक निर्देश का एक और मतलब है, जिसकी ओर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसमें 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की शिक्षा की बात कही गयी है, और उम्र की कोई निचली सीमा नहीं बतायी है। यानी कक्षा 1 से पहले, जिसे आजकल केजी, नर्सरी या पूर्व प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है, तथा स्कूल से पहले आंगनबाड़ियों, बालवाड़ियों की समुचित शिक्षा की व्यवस्था करना भी सरकार की जवाबदेही है। देश के बहुत सारे बच्चे इससे वंचित रहते हैं।

सरकार ने ‘सर्व शिक्षा अभियान’ भी चलाया और उसमें अच्छा-खासा पैसा भी खर्च हो रहा है, लेकिन हमें इन्हें सम्पूर्णता में भारत की शिक्षा की पूरी तस्वीर के साथ देखना होगा। अपने देश में नियो लिबरल पॉलिसी के तहत शिक्षा में भी निजी-करण और शिक्षा का बाजार बनाने का काम जोर-शोर से शुरू हुआ। देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी से सरकार पीछे हटने लगी। सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर उपेक्षित करने, बिगाड़ने और उसके मानदंडों को हल्का करने का काम भी इसके साथ ही हुआ। स्कूली शिक्षा के बदले साक्षरता को पेश किया गया। पूरे शिक्षकों एवं सुविधाओं से युक्त व्यवस्थित शालाओं के स्थान पर एक-दो शिक्षक वाली ‘शिक्षा गारंटी शाला’ तथा प्रशिक्षित-स्थायी शिक्षकों के स्थान पर पैरा-शिक्षकों की बड़े पैमाने पर नियुक्ति भी इसी अवधि में हुई।

पैरा शिक्षक का मतलब समझिये आधे-शिक्षक। पिछले कुछ समय से हमारी सरकारों ने शिक्षा-मित्र, शिक्षा-कर्मी, संविदा शिक्षक, गुरु जी, अतिथि, शिक्षक, लोक शिक्षक, लोक-मित्र, विद्या उपासक, विद्या वालंटियर आदि विभिन्न नामों से ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति शुरू कर दी है, जो अस्थायी होते हैं, अमूमन प्रशिक्षित नहीं होते और जिन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। पुराने किस्म के प्रशिक्षित और पर्याप्त वेतन वाले शिक्षकों की नियुक्ति बंद कर दी गयी है और उनके खाली पदों पर पैरा-शिक्षकों की ही नियुक्ति की जा रही है। अब लगभग सभी स्कूलों में आधे से ज्यादा शिक्षक इसी तरह के हैं। इनका वेतन बहुत कम- एक हजार से लेकर पाँच हजार रूपये मासिक तक ही है। शिक्षा के काम को ठेके और मजदूरी में बदल दिया गया है। ‘अतिथि शिक्षक’ की नियुक्ति तो दैनिक मजदूरी पर ही की जाती है। इतने कम वेतन और रोजगार की अनिश्चितता के हालत में यदि शिक्षक मन लगाकर ठीक से बच्चों को नहीं पढ़ा पाता है, तो उसको ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसा लगता है कि सरकार ने गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोलने की खाना-पूर्ति तो कर दी है, लेकिन वास्तव में उन्हें शिक्षित करने की कोई इच्छा या प्रतिबद्धता उसमें दिखाई नहीं देती।

हालांकि शुरु में ऐसा नहीं था। निजी स्कूलों की संख्या बहुत कम थी, इसीलिये बड़े, प्रतिभाशाली एवं संपन्न लोगों के बच्चे ज्यादातर सरकारी शालाओं या विद्यालयों में ही पढ़ते थे। तब इन विद्यालयों पर सबकी नजर रहती थी, किन्तु धीरे-धीरे स्थितियां बदलने लगीं। अंग्रेजी माध्यम का आकर्षण बढ़ने लगा और इसे भुनाने के लिये निजी स्कूलों की जमात खड़ी होने लगी। निजी स्कूलों की शिक्षा चाहे जैसी भी हो, उसके तड़क-भड़क, युनिफॉर्म और डिसिप्लीन हर किसी को प्रभावित करने लगे। इस बीच मध्यम वर्ग यानी मिडल क्लास का तेजी से उदय हुआ और उसके लिये ये स्कूल स्टेटस सिंबल बन गये। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चे भी सरकारी विद्यालयों से मुंह मोड़ने लगे। स्कूलों में सिर्फ एकदम गरीबों के बच्चे ही जाने लगे। अब वहां क्या हो रहा है, समाज के प्रभावशाली लोगों को इसका पता भी नहीं चल पाता है। न किसी को उन स्कूलों की कोई परवाह रहती है न ये स्कूल और ज्यादा उपेक्षित, वंचित और बुरी हालत में हो गये हैं।

स्कूलों से जुड़ा एक और मुद्दा है प्राइवेट कोचिंग का। माना जाता है कि यह देश के सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाले व सबसे तेजी से बढ़ते हुए उद्योगों में से एक हो गया है। लेकिन यह कोई गर्व या खुशी की बात नहीं है। न ही प्रगति का प्रतीक है। यह सारा पैसा विद्यार्थियों-युवाओं के पालकों की जेब से निकल रहा है। बहुसंख्यक युवाओं के लिए इन प्रतिस्पर्धाओं के दरवाजे बंद हो रहे हैं या प्रतिस्पर्धा ज्यादा गैर-बराबर हो रही है, क्योंकि उनके परिवार के पास कोचिंग के लिए लाखों रूपया नहीं है। लाखों बच्चे विफल होते हैं तथा कुंठित व हीन भावना के शिकार होते हैं।

यदि मुनाफा कमाने वाले निजी स्कूलों को चलने दिया जाता है तो वे इन प्रावधानों से बचने के तरीके निकाल लेंगे। जैसे कैपिटेशन फीस बिना रसीद के लेंगे या ट्यूशन फीस बढ़ा देंगे। यदि मान लिया जाये कि इन स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ सकेंगे, तो भी समस्या हल नहीं होने वाली है। महंगे निजी स्कूलों में गरीब बच्चों की मात्र ट्यूशन फीस ही सरकार देगी। उनमें बाकी कई तरह के शुल्क और खर्च होते है, जिन्हें देना गरीब परिवारों के लिए मुश्किल होगा। केन्द्र सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में 6000 मॉडल स्कूल खोलने का फैसला किया है, जिनमें 2500 स्कूल ‘सार्वजनिक-निजी सहभागिता’ से खोले जायेंगे। मतलब ये हुआ कि सरकारी संसाधनों से निजी फर्मों द्वारा मुनाफे कमाने का यह एक और उदाहरण होगा। सवाल यह भी है कि इनमें कितने बच्चों को शिक्षा मिल पायेगी? देश के बाकी 12 लाख स्कूलों और करोड़ों बच्चों का क्या होगा? ये मॉडल स्कूल या निजी स्कूल देश के बच्चों की शिक्षा की बेहतर व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकते।

यदि हम शिक्षा को जरूरी मानते हैं, उसे प्राथमिकता देते हैं, तो धनराशि कोई बड़ी समस्या नहीं है। कोठारी आयोग ने यह सुझाव दिया था कि सरकार कुल राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत के बराबर राशि शिक्षा पर खर्च करे, लेकिन यह आज तक नहीं हो पाया। वर्ष 2000-01 में केन्द्र व राज्य सरकारों का शिक्षा खर्च कुल राष्ट्रीय आय का 3.19 प्रतिशत था। यह बढ़ने के बजाय 2007-08 में घटकर 2.84 प्रतिशत रह गया है। भारत दुनिया में अपनी राष्ट्रीय आय में से शिक्षा पर खर्च करने वाले देशों में भारत का नबंर 115वाँ है। यह शर्मनाक है। भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने का दावा करने वाली भारत सरकार इस मामले में होड़ और बराबरी क्यों नहीं करती? अनपढ़, अशिक्षित, अज्ञानी नागरिकों का देश कैसे महाशक्ति बनेगा?

सेना व हथियारों पर अरबों खर्च किये जा रहे हैं। हवाई जहाजों, हवाई अड्डों, फ्लाई ओवरों, पाँच सितारा होटलों पर भी बहुत खर्च करती है जो पूंजी-पतियों के हितों को साधने का काम करती है और जो बाजार में निजी-करण को बढ़ावा देकर किया जा रहा है। बच्चों की स्कूली शिक्षा पर यह जरूरी खर्च क्यों नहीं किया जाता है? जिसे आप मनचाहा स्कूल चुनने की आजादी कह रहे हैं, वह तो थोड़े से पैसे वालों के लिए ही है। बहुसंख्यक गरीब लोग तो अपने बच्चों को सरकारी या घटिया सस्ते निजी स्कूल में भेजने को मजबूर है। उनके लिए चुनने की संकल्पना कहाँ है?

पूरी दुनिया पर नजर डालें तो अमेरिका-यूरोप के अनेक देशों में बहुत हद तक कॉमन स्कूल प्रणाली ही चल रही है। जी-8 में शामिल दुनिया के सबसे ताकतवर और विकसित आठ मुल्कों – संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान, रूस, फ्रांस, जर्मनी व इटली में से ब्रिटेन को छोड़कर अन्य सभी में सरकारी पैसों पर चलने वाली उम्दा गुणवत्ता की मजबूत पब्लिक स्कूल प्रणाली है। ब्रिटेन में भी जनदबाव के कारण पब्लिक स्कूल प्रणाली मजबूत हुई है। अमरीका मे तो डेढ़ सौ सालों से पब्लिक स्कूल प्रणाली है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये पब्लिक स्कूल हमारे यहां के निजी ‘पब्लिक’ स्कूलों की तरह नहीं हैं। इन स्कूलों में अमीर-गरीब और विभिन्न नस्लों, मजहबों व भाषाओं के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं।

वहाँ निजी स्कूल तो नाममात्र के है। कॉमन स्कूल सिस्टम के बिना दुनिया का कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता है। जितना निजी करण आज भारत में हो रहा है, उतना दुनिया के किसी भी संपन्न विकसित देश में नहीं हुआ है। यदि दुनिया के बड़े पूंजी-वादी देशों में काफी हद तक कॉमन स्कूल सिस्टम लागू हो सकता है, तो भारत में क्यों नहीं? इसका मतलब है कि सरकार देश के सारे बच्चों को सारी सुविधायुक्त शिक्षा की जिम्मेदारी लेगी। एक गाँव या एक मोहल्ले के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेंगे और इसके लिए कानून बनेगा। सेठ हो या मजदूर, कलेक्टर हो या चपरासी, व्यापारी हो या किसान सबके बच्चे एक साथ पढ़ेगें। उनमें कोई भेदभाव नहीं होगा। पैसे वालों को अपने बच्चे महंगे निजी स्कूलों में भेजने की इजाजत नहीं होगी। जब सारे बच्चे एक साथ पढ़ेगें तो उन स्कूलों की हालत अपने आप सुधरेगी। लेकिन यह अभी एक सपना भर है।

इस गरीब देश में निजी संसाधनों से यह काम नहीं हो सकता। इसके लिए मुफ्त, बिना भेदभाव की शिक्षा का ढाँचा सार्वजनिक संस्थानों को बनाना ही पड़ेगा। जहां फीस लगायी, वहां गरीब वंचित हो जायेंगे। जहां भेदभाव और अलग-अलग पढ़ाई की गुंजाइश बनी, वहाँ साधारण गरीब बच्चों की शिक्षा उपेक्षित, वंचित और कम स्तरीय हो जायेगी। हमारे देश में फंड की भी कोई कमी नहीं है। बस कमी है तो दृढ़ इच्छा शक्ति से कड़े फैसले लेने की। अब समय आ गया है कि सरकारें और पार्टियां मिल-जुल कर देश का भविष्य संवारने के लिये ठोस प्रयास करें।