दलित राजनीतिक एकजुटता की बेबाक पहचान हैं मायावती

दलित राजनीति की पुरोधा मानी जाने वालीं मायावती एक ऐसी राजनेता हैं जिन्होंने सैकड़ों वर्षों से हाशिये पर पड़े गूंगे-बहरे वंचित समाज के कण्ठ को राजनीतिक आवाज दी. बहुजन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाल चुकी हैं और कई बार राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं. मायावती को भारत की पहली युवा और दलित मुख्यमंत्री होने का श्रेय जाता है. वे अपने बेबाक बयानों की वजह से हमेशा चर्चा के केंद्र में रहती हैं.

एक कड़क मुख्यमंत्री के रूप में मायावती का लोहा सारे लोग मानते हैं. सरकार पर उनकी पकड़ कभी ढीली नहीं रहती. वो अकेली मुख्यमंत्री रही हैं, जिन्होंने अपने ही एक दागी दबंग सांसद को अपने निवास पर बुलाकर गिरफ्तार करवाया था. एक कुशल प्रशासक के तौर पर उनकी मिसाल दी जाती है.

15 जनवरी, 1956 को दिल्ली के एक दलित परिवार में जन्मीं मायावती ने बीए करने के बाद दिल्ली के कालिन्दी कॉलेज से एलएलबी किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने बीएड भी किया और अपने करियर की शुरुआत दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षिका के तौर पर की. साल 1977 में वे कांशीराम के सम्पर्क में आयीं. यहीं से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया और वे राजनीति के मैदान में उतर गयीं. कांशीराम के संरक्षण में 1984 में बसपा की स्थापना के दौरान वे कांशीराम की कोर टीम का हिस्सा रहीं.

उन्होंने अपना पहला चुनाव उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था. 5 जून 1995 को मायावती बीजेपी के सहयोग से पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. इस समय मायावती की उम्र महज 39 साल की थी.यह एक ऐतिहासिक पल  था जब देश की कोई दलित महिला पहली बार मुख्यमंत्री बनी थी. इसके बाद मायावती 1997 और 2002 में फिर से बीजेपी की मदद से मुख्यमंत्री बनीं.धीरे-धीरे मायावती का कद पार्टी और प्रदेश की राजनीति में बढ़ता चला गया.

साल 2001 में कांशीराम ने मायावती को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया. साल 2007 में वे प्रचंड बहुमत के साथ चौथी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ हुईं. हालांकि मायावती का राजनीतिक सफ़र विवादों से अछूता नहीं रहा है लेकिन समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक सामान्य महिला की उपलब्धियां निश्चित ही गर्व का विषय हैं. साल 2014 में जब मोदी की सुनामी में अनेक दल अस्तित्व विहीन हो गये , उस दौर में 20 प्रतिशत मतों से बसपा की झोली का आबाद रहना मायावती होने की अहमियत को बताता है. आज भी प्रदेश की राजनीति के समीकरण उन्हीं से तय होते हैं। मायावती ने शादी नहीं की है। उनके समर्थक उन्हें ‘बहनजी’ कहकर संबोधित करते हैं. फिलहाल मायावती 2019 की चुनावी रणभूमि में अपराजेय मोदी के रथ को लगाम लगाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं.

व्यक्तित्व, रणनीतिक समझ, जिम्मेदारी, पार्टी में प्रभाव, छवि और राजनीतिक दखल आदि मानकों को ध्यान में रख कर किये गये देशव्यापी सर्वे में मायावती को धाकड़ नेताओं में अहम स्थान प्राप्त हुआ है.