संयुक्त राष्ट्र में भारत की बुलंद आवाज हैं अकबरूद्दीन

IFS Syyed Akbaruddin, Niti Nirmata, Fame India, Asia Post

कूटनीति और शब्दों के चयन में माहिर 1985 बैच के आईएफएस सैयद अकबरुद्दीन जनवरी, 2016 से संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हैं। उनकी ये सफलता ही कही जायेगी कि हालिया समय में पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में लगातार पराजय का सामना करना पड़ रहा है। आतंकवाद के मुद्दे पर उन्होंने पाकिस्तान को इतनी बार घेरा और बेनकाब किया है कि संयुक्त राष्ट्र के मंच पर पाकिस्तान की हालत दयनीय हो गयी है। हाल ही में जस्टिस दलबीर भंडारी की जीत में भी जब पाकिस्तान विरोध में उतरा तो अकबरुद्दीन ने दुनिया के लगभग सभी इस्लामी देशों को भारत के साथ खड़ा कर भारत विरोधी ताकतों को जोरदार पटखनी दी।

सार्वजनिक कूटनीति के पहुँच में व्यापक विस्तार के लिए सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल करने वाले अकबरुद्दीन की पारिवारिक पृष्ठभूमि पत्राकरिता और शिक्षा से जुड़ी है। उनके पिता एस बशीरुद्दीन ओस्मानिया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख और कतर में भारतीय राजदूत के रूप में काम कर चुके हैं। वे डॉ. बी आर अम्बेडकर ओपेन युनिवर्सिटी के कुलपति और एफटीआईआई के शोध विभाग के निदेशक भी रह चुके हैं। उनकी माँ जेबा श्री सत्य साईँ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापिका थीं। 27 अप्रैल, 1960 को जन्मे अकबरुद्दीन ने राजनीति शास्त्र एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध में मास्टर्स की डिग्री ली है।

अकबरुद्दीन जनवरी, 2012 से अप्रैल, 2015 तक भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रहे। वे संयुक्त सचिव के रूप में विदेश मंत्रालय के एक्सटर्नल पब्लिसिटी ऐंड पब्लिक डिप्लोमैसी विभाग के प्रमुख रहे। वे अक्टूबर, 2015 में भारत-अफ्रीका सम्मेलन के मुख्य समन्वयक भी रहे। वे विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव भी रहे।

वियेना में चार साल तक इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी में प्रतिनियुक्ति के बाद अकबरुद्दीन 2011 में भारत लौटे। वे भारत में पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ माने जाने जाते हैं और उन्होंने 2000 से 2004 तक जेद्दाह में महा वाणिज्य दूतावास समेत क्षेत्र में विभिन्न पदों पर सेवा दी है। वे 2004 से 2005 तक मंत्रालय के विदेश सचिव कार्यालय में निदेशक रहे। अकबरुद्दीन इससे पूर्व 1995-98 के दौरान भी प्रथम सचिव के रूप में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन में काम कर चुके हैं। उस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार और शांति बहाली पर विशेष काम किया था।

अकबरूद्दीन हमेशा पूरी तरह से तैयार रहने वाले प्रवक्ता और विदेश मंत्रालय में डिजिटल कूटनीति के प्रवर्तक के रूप में सामने आये। कहा जाता है कि उनके काम से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें पीएमओ का प्रवक्ता बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से इस प्रस्ताव से इनकार करते हुए कहा कि वे राजनयिक हैं और राजनयिक ही बने रहना चाहेंगे।

सैयद अकबरुद्दीन को विदेश मंत्रालय का अब तक का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक कुशल प्रवक्ता माना जाता है। प्रवक्ता के रूप में उन्होंने हर मुश्किल सवाल से बचे बिना बड़े सधे शब्दों में उनका जवाब दिया। उनकी सूझबूझ का एक अहम उदाहरण देखने को मिला जामा मस्जिद के शाही इमाम द्वारा बेटे को नायब इमाम बनाने के समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाने के मामले में। पत्रकारों के सामने उन्होंने शाही इमाम को जंगल से आती आवाजों के रूप में निरूपित कर दिया और पब्लिसिटी देने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आड़े हाथ लिया था। उन्होंने न सिर्फ एक समझदार राजनयिक का किरदार अदा किया है बल्कि भारत में मुस्लिमों की राष्ट्रभक्त छवि की भी सच्ची तस्वीर पेश की है। फेम इंडिया एशिया-पोस्ट ने अपने ताजा सर्वे में उन्हें देश के प्रमुख प्रभावशाली नीति निर्माताओं में से पाया है।