कदम जमीन पर और निगाहें आसमान पर रखते हैं अहमद पटेल

अहमद पटेल को कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेताओं में से माना जाता है. हालांकि वे तीन बार लोकसभा के और पांच बार राज्यसभा के सांसद रहे हैं, लेकिन उनके शक्तिशाली होने की सिर्फ ये वजह नहीं है. वे कांग्रेस के सर्वोच्च माने जाने वाले नेहरू-गांधी परिवार के बेहद करीबी हैं. 

अहमद पटेल ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत नगरपालिका के चुनाव से की थी, जिसके बाद आगे पंचायत के सभापति भी बन गये. बाद में इन्होंने कांग्रेस पार्टी में प्रवेश किया और उसके बाद गुजरात प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बन गये. जब इमरजेंसी के बाद 1977 के आम चुनाव में इन्दिरा गांधी की हार हुई तब वे उन गिने-चुने कांग्रेसी नेताओं में से थे जो जीत कर लोकसभा पहुंचे थे. तब वे पहली बार पहली बार सांसद बने थे.

उन्होंने इंदिरा गांधी को अपने क्षेत्र भरुच बुलाया जहां से कांग्रेस ने वापसी का सफर प्रारंभ किया. जब 1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी को राजनीति के मैदान में उतारा जा रहा था तब अहमद उनके सारथी बने. वे ताकतवर होने के बावजूद बहुत सरल और शर्मीले स्वभाव के औऱ दकियानूसी सोच से दूर रहने वाले शख्स थे और यही बात राजीव गांधी को उनके करीब लायी. बाद में वे राजीव कैबिनेट में खासे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उसके बाद सोनिया गांधी को कम तरजीह देने वाले नरसिंहाराव से उनकी नहीं बनी. मनमोहन सिंह की सरकार में अहमद पटेल दोबारा सत्ता के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन गये. उन्हें सरकार और गांधी परिवार के बीच की कड़ी के तौर पर जाना जाता था.

उन्होंने हमेशा उसूलों की लड़ाई लड़ी और महत्वाकांक्षा से खासे दूर रहे.  उनके साथ-साथ उनके परिवार के लोग भी बेहद साधारण और लो प्रोफाइल रह कर लोगों से मिलते हैं इसलिये समाज के हर तबके में उनका काफी सम्मान है. 

व्यक्तित्व, रणनीतिक समझ, जिम्मेदारी, पार्टी में प्रभाव, छवि और राजनीतिक दखल आदि मानकों को ध्यान में रख कर किये गये देशव्यापी सर्वे में अहमद पटेल को धाकड़ नेताओं में अहम स्थान प्राप्त हुआ है.