महज एक मुख्यमंत्री ही नहीं, क्रांतिकारी समाज-सुधारक भी हैं नीतीश कुमार

 

यूं तो आजकल देश में कई ऐसे नेता हैं, जो विकास की बातें करते हैं, लेकिन नीतीश कुमार उनमें अकेले हैं, जिन्होंने विकास और समाज-सुधार को आपस में जोड़ दिया है। नतीजा यह कि बीमारू राज्य कहे जाने वाले बिहार में पिछले 12-13 साल में जहां अभूतपूर्व विकास हुआ है, वहीं समाज सुधार के अनेक क्रांतिकारी कदम भी समानान्तर रूप से उठाए जा रहे हैं। दरअसल, नीतीश कुमार मज़बूत इरादों वाले एक ऐसे स्वप्नजीवी मुख्यमंत्री हैं, जो बिहार की बेहतरी के लिए न सिर्फ़ नित नए-नए आइडियाज़ ढूंढ़ते रहते हैं, बल्कि एक बार जो ठान लेते हैं, उसे कर दिखाते हैं। यह उनके सौम्य व्यक्तित्व और शानदार कृतित्व का ही नतीजा है कि आज पूरे देश में लोग उन्हें सुशासन बाबू के नाम से जानते हैं।

बिहार के विकास और सामाजिक परिवर्तन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के योगदान को समझने के लिए सबसे पहले राज्य की सड़कों का ज़िक्र ज़रूरी है। 2005 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तब बिहार की सड़कों के लिए व्यंग्य में कहा जाता था कि यहां सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढ़े में सड़क, पता ही नहीं चलता। ऐसी खस्ताहाल सड़कों पर न सिर्फ़ हादसे हद से ज्यादा होते थे, बल्कि अक्सर अस्पताल ले जाए जाते समय गंभीर मरीज़ों की रास्ते में ही मौत हो जाया करती थी। बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओँ के रास्ते में ही गर्भपात की घटनाएं भी सामने आती रहती थीं। ख़राब सड़कों का फायदा उठाकर अपराधी भी लूट-पाट की वारदातें ज़्यादा करते थे। राज्य में निवेश आना तो दूर, छोटा-मोटा व्यापार करना भी आसान नहीं था।

लगता ही नहीं था कि बिहार आज़ाद भारत का कोई प्रदेश है, लेकिन नीतीश कुमार ने इसे एक बड़ी चुनौती की तरह लिया और न सिर्फ़ राज्य की पुरानी खस्ताहाल सड़कों को दुरुस्त करवाया, बल्कि नई सड़कों का जाल भी बिछा दिया। भारतीय जनता पार्टी के साथ उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की मिली-जुली सरकार ने केंद्र की योजना ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ के साथ ही, कम आबादी वाले बसावटों को जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री ग्रामीण संपर्क योजना की शुरुआत की। इतना ही नहीं, राज्य की अनेक सड़कों को स्टेट हाइवे में परिणत किया और उनके मेंटेनेंस के लिए नई पॉलिसी बनायी। प्रमुख ज़िला सड़कों का भी निर्माण कराया गया। नेशनल हाइवेज़ की ख़राब स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने अपनी तरफ से काफी धन लगाया और उनकी हालत सुधारी।

नीतीश सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया कि बिहार के किसी सुदूर इलाके से भी चलकर लोग अधिकतम छह घंटे में राजधानी पटना पहुंच सकें और इस लक्ष्य को हासिल भी कर दिखाया। अब नीतीश सरकार का नया लक्ष्य है, सुदूर इलाकों से पटना पहुंचने में पांच घंटे से अधिक समय न लगे। इसके लिए समूचे राज्य में जगह-जगह सड़कों, फ्लाइओवरों और पुलों-पुलियों का निर्माण तेज़ गति से चल रहा है।

बिहार के माहौल को बदलने के लिए नीतीश कुमार ने दूसरा बड़ा काम कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में किया। 2005 से पहले जहां अपने अपहरण और फिरौती उद्योग के चलते बिहार पूरे देश में बदनाम हो गया था, वहीं सत्ता संभालते ही नीतीश ने अपराधियों के खिलाफ़ राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा और प्रभावी अभियान छेड़ा। देखते ही देखते 60 हज़ार से ज्यादा अपराधी जेल के अंदर थे। नतीजा यह हुआ कि राज्य की कानून-व्यवस्था फौरन पटरी पर आ गई। नीतीश कुमार कहते हैं कि अपराधियों की जगह जेल में है और उनके राज में कोई भी अपराधी खुले में नहीं रह सकता।

नीतीश सरकार का तीसरा सबसे क्रांतिकारी योगदान रहा है शिक्षा के क्षेत्र में। एक तरफ जहां बिहार के युवक सिविल सेवा से लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल तक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यहां साक्षरता, खासकर कन्या साक्षरता की दर काफी कम थी। हालात बदलने के लिए नीतीश कुमार ने प्राथमिक शिक्षा से शुरुआत की और शैक्षणिक ढांचे का विकास किया। पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से करीब चार लाख शिक्षकों को नियोजित किया। साथ ही, करीब 27 हजार नए स्कूलों का निर्माण कराया, सभी स्कूलों को एक रंग में रंगवाया और जितने मध्य विद्यालय थे, उन सबमें चारदीवारी बनवाई। इन सब क्रांतिकारी कदमों का नतीजा यह हुआ कि नीतीश के सत्ता संभालते समय जहां करीब साढ़े बारह प्रतिशत बच्चे स्कूलों से बाहर थे, वहीं आज इनकी संख्या एक प्रतिशत से भी कम रह गई है।

लड़कियों की शिक्षा बड़ी चुनौती थी, क्योंकि बड़ी संख्या में लड़कियां आगे की शिक्षा तो छोड़िए, अपर प्राइमरी स्कूल में भी नहीं जा पाती थीं। गरीबी के कारण माता-पिता अपनी बेटियों को अच्छे कपड़े नहीं सिला सकते थे, इसलिए स्कूल भेजना बंद कर देते थे। नीतीश सरकार ने इस स्थिति को भांपते हुए मिडिल स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए पोशाक योजना शुरू की। फिर आठवीं के बाद भी लड़कियों को पढ़ने में कोई व्यवधान न आए, इसके लिए 9वीं क्लास की छात्राओं के लिए साइकिल योजना की शुरुआत की। एक ऐसे राज्य में, जहां शहर में भी अगर कोई लड़की साइकिल चलाती दीख जाती थी, तो लोग ताने कसने लगते थे, उसी राज्य में नीतीश कुमार के एक फैसले से नवीं क्लास की सभी छात्राओं को साइकिलें मिल गईं। जब वे एक रंग की पोशाक पहनकर समूह में साइकिल चलाते हुए अपने-अपने स्कूलों के लिए निकलती थीं, तो इस महान सामाजिक परिवर्तन की बयार को आसानी से महसूस किया जा सकता था। नीतीश ने जब इस स्कीम की शुरुआत की, तो नौवीं क्लास में लड़कियों की संख्या एक लाख सत्तर हजार से भी कम थी और आज यह संख्या 9 लाख से भी ज्यादा हो गई है। लड़कियों के बाद पोशाक और साइकिल योजना को लड़कों के लिए भी लागू कर दिया गया।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी नीतीश सरकार ने कई महत्वपू्र्ण काम किए। फंड की दिक्कतों के चलते जहां शिक्षकों को तनख्वाह चार-पांच महीने पर मिला करती थी, वहीं अब ये हर महीने की पहली तारीख को मिलती है। विश्वविद्यालयों में सेशन दो-दो साल तक लेट थे, लेकिन उसे भी ऐकेडमिक कैलेंडर बनाकर अब ठीक कर दिया गया है।

चूंकि मुख्यमंत्री स्वयं इंजीनियर थे, इसलिए राज्य में तकनीकी और रोज़गारपरक शिक्षा को बढ़ावा देने की अहमियत को समझते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। बिहार में जितने रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज यानी आरआईटी थे, उन सबको अपग्रेड करके एनआईटी में तब्दील कराया गया। प्रतिष्ठित बीआईटी मेसरा की एक शाखा पटना में भी खुलवायी गई। 500 एकड़ जमीन देकर पटना में आईआईटी की स्थापना करवाई गई। केंद्र सरकार को राज्य के हिस्से से अधिक अंशदान देकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी खुलवाया गया। राज्य सरकार ने अपनी तरफ से चाणक्या लॉ यूनीवर्सिटी बनवाई और आईआईएम की तर्ज पर चंद्रगुप्त इंस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेंट की स्थापना की। इसके अलावा, शून्य का आविष्कार करने वाले महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट के नाम पर आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी की स्थापना की। साथ ही, कई एग्रीकल्चर कॉलेज, हॉर्टीकल्चर कॉलेज, मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज भी खोले गए। लेकिन नीतीश कुमार इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं। उनका सपना बड़ा है। वे राज्य में पांच नए मेडिकल कॉलेज खोलने के अलावा हर जिले में इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलिटेक्निक खोलना चाहते हैं। साथ ही, हर मेडिकल कॉलेज में एक नर्सिंग कॉलेज, हर सबडिविजन में एक एएनएम इंस्टीट्यूट और हर जिले में एक जीएनएम इंस्टीट्यूट और पैरा मेडिकल इंस्टीट्यूट भी खोलना चाहते हैं।

शिक्षा से ही जुड़ी चीज़ है रोज़गार और रोज़गार एवं शिक्षा के लिए बिहार से नौजवानों का पलायन आज भी एक बहुत बड़ी समस्या है। देखा जाए तो इस समस्या पर अब तक कोई भी सरकार काबू नहीं पा सकी है। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सात निश्चयों में शिक्षा और रोज़गार को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। अभी बिहार में मात्र 30.9 प्रतिशत छात्र ही हायर एजुकेशन ले पाते हैं, लेकिन नीतीश सरकार ने शॉर्ट टर्म में इसे 35 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना, युवाओं को अंग्रेज़ी-कम्प्यूटर आदि सिखाने के लिए कुशल युवा कार्यक्रम, बाहर इंटरव्यू देने जाने के लिए पैसे की कमी न हो इस मकसद से सेल्फ हेल्प एलाउंस, सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मुफ्त वाई फाई कनेक्टिविटी, युवा उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए वेंचर कैपिटल फंड का गठन आदि नीतीश सरकार के कुछ अन्य क्रांतिकारी कदम हैं।

इन सबके अलावा, पिछले दो वर्षों में नीतीश कुमार ने दो ऐसे कदम उठाए हैं, जिसने उन्हें नेता के साथ-साथ एक बड़े समाज-सुधारक के तौर पर स्थापित किया है। ये कदम हैं शराबबंदी और दहेजबंदी के। नीतीश सरकार ने अप्रैल 2016 से ही राज्य में पूर्ण शराब बंदी लागू कर दी है। इसे राज्य के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत कहा जा सकता है। इसके बाद, 21 जनवरी 2017 को राज्य सरकार की अपील पर शराब और नशे के खिलाफ़ समूचे राज्य में मानव श्रृंखलाएं बनाई गई थीं, जिनमें करीब 4 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया। आज शराबबंदी की वजह से अपराधों और खासकर महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं, बीमारियों इत्यादि में काफी कमी आई है। इतना ही नहीं, शादी-ब्याह जैसे अहम मौकों पर बारातियों का शराब पीकर हुड़दंग करना बंद हो गया है। छोटी-मोटी आमदनी वाले लोग, जो अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा शराब और नशे में गंवा देते थे, आज वे उन पैसों को अपने परिवार की बेहतरी और अच्छे खाने-पीने, कपड़े-लत्ते, पढ़ाई-लिखाई में खर्च कर रहे हैं। शराबबंदी की वजह से राजस्व घाटे का जो अनुमान लगाया गया था, उसकी भी अब धीरे-धीरे भरपाई हो रही है। पहले इससे पांच हज़ार करोड़ के राजस्व घाटे का अनुमान था, लेकिन 2016-17 के अंतिम आंकड़ों के मुताबिक, महज एक हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। नीतीश कहते हैं कि “अब ये कमी भी खत्म हो जाएगी और व्यापार बढ़ेगा, क्योंकि अंततोगत्वा सरकार को तो टैक्स आएगा ही।”

शराबबंदी की अपार सफलता से उत्साहित नीतीश ने एक और भागीरथ प्रयास तेज़ कर दिया है- दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ। जहां दहेज प्रथा के चलते लड़कियों की शादी में दिक्कतें आती हैं और शादी के बाद भी उनके ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा की वारदातें होती हैं, वहीं बाल विवाह के चलते कम उम्र में ही गर्भ धारण के चलते अक्सर मांओं की जान चली जाती है और बच्चे भी तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होते हैं। खासकर, बौनेपन के शिकार जितने बच्चे हैं, उनमें बहुत बड़ा अनुपात बाल विवाह के कारण पैदा हुए बच्चों का है। बिहार में बाल विवाह कितनी बड़ी कुप्रथा के रूप में विद्यमान है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां होने वाली लगभग 39 प्रतिशत शादियां बाल विवाह हैं।

नीतीश कहते हैं कि “जो लोग गांव-देहात में बाल विवाह करते हैं, वे सोचते हैं कि बच्ची जब बड़ी हो जाएगी, तो दहेज ज्यादा लगेगा। इसलिए हम लोगों ने तय किया कि बाल विवाह और दहेज प्रथा दोनों के खिलाफ सशक्त अभियान चलाएंगे।” अब जैसे नशे के खिलाफ़ 21 जनवरी 2017 को 4 करोड़ लोगों की मानव शृंखला बनाई गई थी, उसी तरह 21 जनवरी 2018 को भी बाल विवाह एवं दहेज प्रथा की समाप्ति के लिए मानव श्रृंखला बनायी जाएगी।

नीतीश कुमार ने अगस्त 2015 में अपने सात निश्चयों के ज़रिए बिहार में तरक्की और सामाजिक परिवर्तन के एक नए दौर की बुनियाद रख दी है। इन सात निश्चयों में 2018 के अंत तक हर बसावट तक बिजली पहुंचाना और हर इच्छुक परिवार को बिजली का कनेक्शन देना।
गांव हो या शहर, हर घर तक पक्की गली और नाली का निर्माण कराना।
हर घर में नल का जल पहुंचाना, ताकि पानी की कमी और पानी से होने वाली बीमारियों को दूर किया जा सके।
महिलाओं को राज्य सरकार की नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण देना, जिसे कि पिछले ही साल लागू किया जा चुका है।
हर घर में शौचालय निर्माण को प्रोत्साहित करना।
हर बच्चे को लिखने-पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करना और, युवाओं में कौशल-विकास, आर्थिक सहायता और रोजगारोन्मुखी कार्यक्रमों से जोड़ना शामिल हैं।

इन सबके अलावा, किसानों की हालत सुधारने और कृषि के क्षेत्र में बेहतरी के लिए एक कृषि रोडमैप भी बनाया, जिसे 2012 में लागू किया गया। इसकी वजह से राज्य में सीड रिप्लेसमेंट रेट और वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। साथ ही, धान हो या गेहूं, मक्का हो या अन्य फसलें, आज बिहार में प्रोडक्टिविटी नेशनल एवरेज के पास है या उससे ज्यादा है। धान की प्रोडक्टिविटी सबसे ज्यादा चीन की थी। बिहार ने उसके रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है। नीतीश कुमार के मुताबिक “एग्रीकल्चर रोड मैप का हमारा एक ही लक्ष्य है कि हमारे किसानों की आमदनी बढ़े। हमारे यहां किसानों की परिभाषा सिर्फ वही किसान नहीं हैं, जो ज़मीन के मालिक हैं, बल्कि वे भी हैं, जो खेत में काम करते हैं। उन तमाम किसानों की आमदनी बढ़े, हमारी उत्पादकता बढ़े। हम लोगों का लक्ष्य ये भी है कि हर हिंदुस्तानी की थाली में बिहार का एक व्यंजन ज़रूर हो।”

ज़ाहिर है, नीतीश कुमार सिर्फ़ एक लोकप्रिय नेता या मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी समाजसुधारक भी हैं, जिनका ध्यान पूरी तरह से अपने राज्य और उसके नागरिकों के आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास पर केंद्रित है। कहना नहीं होगा कि यह नीतीश कुमार के पिछले 12 साल के सुशासन की ही देन है कि आज बिहार से बाहर रहने वाला कोई बिहारी खुद को बिहारी कहने में शर्म नहीं, बल्कि गौरव का अहसास करता है।