पारिवारिक शक्ति का लाभ ही मिलता है समाज को – मृदुला सिन्हा

mridulaसाहित्यकार और राजनीतिज्ञ में एक बड़ी समानता है, दोनों को अतीव संवेदनशील होना चाहिये. स्त्री सशक्तिकरण, पुरुष सशक्तिकरण, बाल सशक्तिकरण और वृद्ध सशक्तिकरण से बढकर परिवार सशक्तिकरण के उपाय ढूंढने चाहिये तभी समस्याओं का सही विवेचन और समाधान होगा, ये कहना है गोवा की राज्यपाल महामहिम मृदुला सिन्हा का।
परिवार-समाज के साथ सियासत और साहित्य पर टीम फेम इंडिया की मृदुला सिन्हा से बातचीत के प्रमुख अंश –

आप तो साहित्यकार थीं, फिर राजनीति में कैसे उतर आयीं?
राजनीति तो साहित्य के साथ-साथ चलती है, साहित्य तो सत्यम, शिवम, सुन्दरम से ओत-प्रोत होना ही चाहिये, लेकिन राजनीति का भी वही उद्देश्य है। संस्कारी मनुष्य, परिवार और समाज की रचना करना साहित्य का उदेश्य है। उसके द्वारा रचित समाज भी सत्यता, शिवत्व और सुंदरता के आसपास हो, परंतु समाज की ऐसी रचना में राजनीति का भी महत्वपूर्ण योगदान है। समाज को सुखी और संपन्न, व्यक्ति को शिक्षित और समर्थ बनाना राजनीति का लक्ष्य है। राजनीति और साहित्य दूर-दूर नहीं हैं, समाज में ऐसे साहित्यकार और राजनेता उत्पन्न होते रहे हैं जो पुन: अपनी पुरातन संस्कृति के अनुकूल समाज को ले जाने का संकल्प लेते हैं। ऐसे साहित्यकार और ऐसे नेता कालजयी होते हैं। हमारे समाज में ऐसे कालजयी साहित्यकारों और नेताओं की कमी नहीं, जो आज भी समाज के लिये अनुकरणीय हैं।

क्या आपको राजनीति में कोई बुराई नजर नहीं आती?
समाज में किसी क्षेत्र के दो-चार व्यक्तियों और घटनाओं को लेकर ही धारणा बनाने की पहल होती है। कभी-कभी धारणा बनाने में हम जल्दबाजी भी कर लेते हैं। राजनीति के प्रति जो धारणा बनी है, वह गलत नहीं है। ऐसे लोगों का राजनीति में प्रवेश हो चुका है, जिनका लक्ष्य शीघ्रता से कोई पद प्राप्त करना और आर्थिक लाभ उठाना है। ऐसे लोगों ने राजनीति को बदनाम भी किया है। राजनीति का दीर्घ-गामी लक्ष्य होता है। अपना नहीं, जनता का हित देखना होता है। आज भी राजनीति में आने वाले लोगों में राजनीति के सही अर्थ को समझने वालों की संख्या अधिक है, इसलिये थोड़ी बहुत खामियों के साथ राजनीति सही राह पर ही चल रही है।

क्या आपको लगता है सरकार महिला आरक्षण बिल पारित कर देगी?
1996 के लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दल के चुनाव घोषणा पत्रों में विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण के संकल्प लिये गये थे। तब से लेकर आज तक हर चुनाव के पूर्व वही संकल्प दोहराया जाता है। महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भी ढेर सारे प्रस्ताव पारित किये, आंदोलन भी हुए, लेकिन बात ठहर सी गयी है। इस बार शासक दल में लोकसभा सदस्यों की संख्या तीन सौ पैंतीस है और इस बार तो किसी अन्य दल से समर्थन व सहयोग लेने की भी आवश्यकता नहीं है। समाज का मन इसे स्वीकार करने के लिये तैयार भी हो गया है, इसलिये आशा की जा सकती है कि इस बार लोकसभा में भी इस विधेयक को पारित करा लिया जायेगा। देर आयद, दुरुस्त आयद की स्थिति बनेगी।

नारी सशक्तिकरण पर आपकी क्या राय है?
जिस मायने में नारी सशक्तिकरण की चर्चा होती है, मैं उसमें विश्वास नहीं करती हूं। मैं उस महिला विमर्श से सहमत नहीं हूं, जो स्त्री को परिवार से अलग करके खड़ा करता है और फिर उसकी समस्याओं का अलग आकलन करता है। समस्याओं के समाधान में भी बाहर के लोगों को लगाता है, परिवार के सदस्य को नहीं। मैंने इन दिनों कहना प्रारंभ किया है कि स्त्रियों, पुरुषों, बच्चों और वृद्धों के लिये अलग-अलग सशक्तिकरण नहीं, बल्कि पूरे परिवार के सशक्तिकरण के उपाय ढूंढ़ने चाहिये। तभी समस्याओं का सही विवेचन और समाधान होगा। परिवार की शक्ति का लाभ समाज को भी मिलेगा। स्त्री का विमर्श परिवार विमर्श में ही रेखांकित हो।

गोवा पहुंच कर आपको ये नहीं लगता कि आप बिल्कुल अलग माहौल में आ गयी हैं?
भिन्न नहीं हैं बिहार और गोवा की संस्कृतियां और इनमें तालमेल की कोई आवश्यकता नहीं है। गोवा की लोक-संस्कृति पर भी जब विचार किया और जानने का समय मिला, तो यह बिहार या अन्य राज्यों से अलग नहीं है। गोवा वासियों के पांव अपनी संस्कृति में गहरे धंसे हैं। दोनों राज्यों में भाषा की विभिन्नता के सिवाय लोक-संस्कृति की कोई भिन्नता नहीं है, इसलिये मुझे दोनों समाज अपने में बांधते हैं। थोड़ी-सी भिन्नता है भी तो सिर्फ खान-पान में।

साहित्य, समाज और सियासत के बीच सामंजस्य किस तरह बिठाती हैं?
जिसके ऊपर अधिक जिम्मेदारियां रहती हैं, उसे अपने कामों के बीच सामंजस्य बिठाना ही पड़ता है। सख्ती से पालन करना पड़ता है। फिर तो सभी जिम्मेदारियां पूरी होती रहती हैं। उनका मानना है कि रचना, सामाजिक और सियासत की जिम्मेदारियों से मिलता-जुलता कार्य क्षेत्र है साहित्य। समय के नियोजन के कारण इन सबसे सामंजस्य बिठाने की पूरी कोशिश करती हूं और इसमें काफी हद तक कामयाब भी हूं।

आगे की नीतियों के बारे में कुछ बतायें?
मैं चाहती हूं कि अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के अलावा जनता के बीच कार्यक्रमों में भी पूरी भागीदारी रखूं। इनके साथ-साथ महिला होने के नाते मुझे अपने सारे कर्तव्य निभाकर सुख और संतोष मिलता है।

फेम इंडिया के जरिये लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
सेवा भाव से राजनीति में आयें। ज्यादातर अच्छे से अच्छे लोगों को राजनीति में प्रवेश करना चाहिये। समाज हित अपना ध्येय बनाना चाहिये। अन्तत: उन्हीं का लाभ होता है, उन्हें ही पहचान मिलती है, सम्मान मिलता है।