नारी सशक्तिकरण की संपूर्ण हस्ताक्षर हैं डॉ. ज्योत्सना चटर्जी

 

डॉक्टर ज्योत्स्ना चटर्जी सामाजिक क्षेत्र में एक जाना माना नाम है। सतहत्तर वर्षीया डॉ. चटर्जी स्वयं सेवी संस्था जॉइंट वीमेन प्रोग्राम की डायरेक्टर है और दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी क्षेत्र में `मेरा सहारा’ प्रोटेक्शन सेंटर चलाती हैं। लगभग चालीस साल से डॉ चटर्जी औरतों से जुड़े सामाजिक मसलों पर काम कर रही हैं। ज्योत्स्ना `दी’ के नाम से जानी जाने वाली,  डॉ. चटर्जी ने महिला आरक्षण बिल को पास करवाने की मुहिम में फिर से जोश भर दिया है और दिल्ली और दूसरे शहरों के तमाम महिला संगठन इकट्ठे होकर इस बिल को पास करवाने की मुहिम में जुट गये हैं।  समय-समय पर धरना व प्रदर्शन, राजनेताओं से मिलना, सरकार के मंत्रियों से मिलकर अपनी मांगों को दोहराना जैसे काम जे डब्लू पी और अन्य महिला संगठन पिछले साल भर से लगातार कर रहे हैं।  और आज इनकी यह लड़ाई सड़क से संसद के द्वार पर दस्तक दे रही है।  फेम इंडिया ने डॉ.  ज्योत्सना चटर्जी से खास बातचीत की और यह जानने की कोशिश की कि उनको चालीस साल के संघर्ष में क्या सफलता मिली।

आपने सामाजिक क्षेत्र में काम करना कैसे शुरू किया?

मैं पहले कलकत्ता यूनिवर्सिटी में इंग्लिश पढ़ाती थी और मेरे पति एक सोशलिस्ट, इकोनॉमिस्ट और कॉलेज में प्रिंसिपल थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि इंग्लिश पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है और जमीन पर रहने वाले गरीब और दबे-कुचले लोगों को देखो. और इस बात ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया। फिर मैं अपनी पति के साथ साधारण लोगों के बीच जाकर काम करने लगी। मैंने कलकत्ता युनिवर्सिटी के सीनेट का इलेक्शन जीता था जिससे मुझे दूर-दराज के कॉलेजों में काम कर रहे लोगों से मिलने का मौका मिला। तब मुझे पता चला कि छोटे इलाकों में रह रहे लोगों को कितनी कम सुविधाएं मिलती हैं और वह कैसे अपना गुजारा करते हैं। महिलाओं के हालात और भी खराब थे। मैंने उनकी सशक्तिकरण के लिए काम करना शुरू किया क्योंकि अशिक्षा  और आर्थिक तंगी के रहते कुछ भी संभव नहीं था। सत्तर दशक के में पति का तबादला बैंगलोर हो गया तो मैंने वहाँ जाकर बस्तियों में काम करना शुरू किया। वहां मैंने मैत्री महिला संगठन का गठन किया औऱ महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों की जानकारी देने का बीड़ा उठाया। धीरे-धीरे वहां के छोटे छोटे महिला संगठन हमसे जुड़ने लगे  तब 1977-78 में इस संगठन का नाम  बदलकर जॉइंट वीमेन्स प्रोग्राम रख दिया। साउथ के प्रदेशों में हमने बहुत काम किया। यही वजह रही कि राष्ट्रीय महिला संगठनों ने जाइंट वीमेन्स प्रोग्राम को सात महिला संगठनों में शामिल कर दिया।

कर्नाटक में  देवदासी  प्रथा के खिलाफ  आपकी संस्था ने क्या कदम  उठाये?

कर्नाटक में काम करते समय, हमने पाया कि बेलगाम और उसके आसपास के इलाके में देव दासी प्रथा प्रचलित थी जिसकी तहत नीची जाति की लड़की के बालों में यदि गांठ पड़ जाये तो उसे “भगवान येलम्मा ने मांगा है” कहकर मंदिर के पुजारी और बड़े जमींदार उसे देवदासी बना देते थे और फिर उसका गलत इस्तेमाल करते थे। किसी दूसरी लड़की के मिलने पर एक देवदासी को रिटायर कर देते थे और जिसे देह व्यापार के सौदागर ले जाकर मुम्बई, कलकत्ता या हैदराबाद के रेड लाइट इलाकों में बेच देते थे। हमने इस पर रिसर्च कर कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवराज अर्स को रिपोर्ट सौंपी जिन्होंने इस पर पाया कि यह बात सच थी। कर्नाटक देवदासियों (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम, 1982 बना और 1984 में यह कानून बन गया। इसके आलावा हमारी संस्था ने  महिलाओं और लड़कियों में अनैतिक तस्करी के दमन अधिनियम 1956 के संशोधन में नये क्लॉज़ सजा का प्रावधान करवाया।

महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण से जुड़े मुद्दों पर आप क्या विचार रखती हैं ?

हम इस विषय पर कई स्तर पर काम कर रहे हैं। मैं कई संस्थाओं और विभागों से जुड़ी हूं जो कार्य-स्थलों पर नारी उत्पीड़न के मामलों पर नजर रखते हैं। शाहबानो प्रकरण के दौरान हमारी संस्था ने तलाक़ पाने वाली मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ते का मामला उठाया। हमने कहा था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड देश में होना चाहिए और इस पर बहस होनी चाहिए। उस पर यह तय हुआ था कि यूनिफार्म सिविल कोड संभव नहीं है जब तक रिलीजियस समिति अपने आप बदलती नहीं है।

कुछ दिनों पहले यूनिफार्म सिविल कोड की जब बात हुई तो कई पार्टियों ने उसका विरोध किया। आप उससे कितना इत्तफाक रखती हैं?

यूनिफॉर्म सिविल कोड एक अच्छा आइडिया है और इसका इस्तेमाल भी हो रहा है।  स्पेशल मैरिज ऐक्ट एक उदाहरण है।  ईसाई धर्म के लोग कहते हैं कि उनका ज्यादा डिफरेंस नहीं है जैसे कि डाइवोर्स  म्यूच्यूअल कंसेंट कानून है लेकिन मुस्लिम कम्युनिटी ने अपने कानून में कोई परिवर्तन नहीं किया है और वो अब समय मांग रहे हैं इस पर विचार के लिये।  इस विषय पर बहस जारी है।

बच्चों के अधिकारों को लेकर आपने लड़ाई लड़ी है?

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का ग्राउंड वर्क मैंने अपनी संस्था जे डब्लू पी के जरिये किया था। मैंने मांग की थी की चाइल्ड मैरिज पर प्रतिबन्ध लगाने के मांग की थी लेकिन सरकार ने  बाल विवाह निषेध की बात कही।  हमारी काफी बातों  को सरकार ने मना  और इस कानून में प्रावधान लायी।

33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल कब कानून  बनेगा ?

यह बिल कांग्रेस सरकार के वक्त राज्य सभा में पास हुआ. लेकिन लोक सभा में नहीं क्योंकि पॉलिटिकल विल नहीं थी। इसमें समय लगेगा. हम लोगों ने इस लड़ाई को फिर से शुरू किया है शायद अगले सत्र में आये। जब तक यह पास नहीं होता हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।