देश में दलित समाज का चेहरा बन ग‌ए हैं जिग्नेश मेवाणी

प्रखर, प्रभावी और आक्रामक जिग्नेश मेवाणी नए दौर के दलित नेता के रूप में उभरे हैं. उनकी आँखों में दलितों के उत्थान के लिए कुछ कर गुजरने की चाह साफ़ झलकती है. बिना किसी पार्टी में शामिल हुए जिग्नेश ने पहली ही बार में गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत
हासिल की और वाडगाम विधानसभा सीट से विधायक बने.

11 दिसम्बर 1982 में गुजरात के अहमदाबाद में जन्मे मेवाणी तब अचानक सुर्खियों में आए जब उन्होंने ऊना में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों को पीटे जाने के विरोध में वेरावल में घोषणा की कि ‘अब दलित लोग समाज के लिए ”गंदा काम” ‘ यानी मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालना, मैला ढोना आदि नहीं करेंगे. उन्होंने तत्कालीन भाजपा सरकार से कहा, ‘गाय की दुम आप
रखो, हमें हमारी ज़मीन दो’. ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ महात्मा गांधी की ‘दांडी यात्रा’ से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने दलितों की यात्रा का आयोजन किया और उसे नाम दिया “दलित अस्मिता यात्रा.” हज़ारों दलित कार्यकर्ताओं ने इस यात्रा में जिग्नेश का साथ दिया.

जिग्नेश मेवाणी ने साल 2003 में एच के आर्ट्स कॉलेज अहमदाबाद से इंग्लिश में ग्रेजुएशन किया है. यही वो संस्था है जहाँ मेवाणी के वैश्विक नजरिये को आकार मिला. साल 2004 में उन्होंने पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मुंबई चले गये, जहाँ उन्होंने 3 साल तक एक मैग्जीन ‘अभियान’ में बतौर पत्रकार काम किया. साल 2008 में वे लौट आए और उन्होंने कार्यकर्ता-वकील मुकुल सिन्हा द्वारा संचालित नागरिक अधिकार संगठन जन संघ मंच (जेएसएम) के साथ काम करना शुरू कर दिया. मुकुल सिन्हा के ही कहने पर जिग्नेश ने गुजरात
यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया. इस दौरान उन्होंने दंगा पीड़ितों और वर्कर यूनियन के लिए भी लड़ाई लड़ी.वे गुजरात में आम आदमी पार्टी से भी जुड़े, लेकिन थोड़े ही समय में इस्तीफ़ा दे दिया.

पत्रकार, वकील फिर सामजिक कार्यकर्ता और अब नेता बने मेवाणी विभिन्न मोर्चों पर सामाजिक कार्यों से जुड़े रहकर दलितों, मज़दूरों व किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं. गुजरात के वडगाम विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद मेवाणी दे