दलित आक्रोश और विद्रोह का नया नाम: चंद्रशेखर आज़ाद

बाबा साहब के विचारों को जीवन में आत्मसात कर अपनी जाति को समाज में सम्मान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध चंद्रशेखर आज़ाद एक दलित एक्टिविस्ट हैं. पेशे से वकील चंद्रशेखर भीम आर्मी के संस्थापक हैं. ये खुद को ‘रावण’ कहलाना पसंद करते थे लेकिन मीडिया में इनके ‘रावण’ नाम से नकारात्मक प्रचार के चलते इन्होंने अपना उपनाम ‘रावण’ से ‘आज़ाद’ कर दिया.

चंद्रशेखर के मुताबिक एक दिन पिता की बीमारी के कारण वे सहारनपुर के हॉस्पिटल गये. वहां पर वे दलितों की असली परेशानियों से रूबरू हुए. इसके बाद ही चंद्रशेखर एक दलित
एक्टिविस्ट बन गये और साल 2015 में उन्होंने भीम आर्मी एकता मिशन नाम के संगठन की स्थापना की, जो दलितों के लिए पढ़ाई व अन्य सेवाएं प्रदान करने जैसे काम करती है. यूपी सहित देश के सात राज्यों में फैली इस संस्था में करीब 40 हजार सदस्य जुड़े हुए हैं. पश्चिम उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी का खासा प्रभाव है, जो दलित आंदोलन के जरिए अपनी जड़ें जमाना चाहती है.

चंद्रशेखर आज़ाद साल 2015 में पहली बार चर्चा में तब आये थे जब इन्होंने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के चटमलपुर के पास स्थित अपने गाँव घडकौली के बाहर एक बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा था ‘ दा ग्रेट चमार्स भीम राव अंबेडकर ग्राम घडकौली आपका हार्दिक
अभिनंदन करता है’.
2017 में सहारनपुर में जातीय दंगा फैलाने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल भेजा गया था. चंद्रशेखर की रिहाई की मांग को लेकर भीम आर्मी ने लखनऊ से दिल्ली तक प्रदर्शन किया था. 14 सितम्बर 2018 को इनको जेल से समय से पहले रिहा कर दिया गया. इस फैसले को लोकसभा चुनावों से पहले दलितों की नाराजगी दूर करने के दांव के तौर पर देखा जा रहा है. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इनके नेतृत्व में भीम आर्मी की मजबूती बढ़ती जा रही है