जनसरोकार के कार्य के लिये प्रसिद्ध:- सावित्री ठाकुर

मध्यप्रदेश के धार निर्वाचन क्षेत्र से बीजेपी की सांसद सावित्री ठाकुर की ज़िन्दगी का सफ़र बहुत मुश्किलों भरा रहा है. घर में चार बहनों में सबसे बड़ी थीं. बहुत कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी इनके कन्धों पर आ गयी इसलिए 10वीं के बाद इनको पढ़ाई छोड़नी पड़ी. सावित्री ने जो नहीं छोड़ा वो था जीने का जज़्बा और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत. परिवार पालने के लिए पीसीओ बूथ चलाया. अपने साथ-साथ दूसरी आदिवासी महिलाओं को भी आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए स्वयं सेवा संस्थाएं बनायीं. इस दौरान ये आरएसएस की विचाधारा से प्रभावित हुईं और समाजसेवा को ही जीवन का ध्येय बना लिया. इस कट्टर आरएसएस कार्यकर्ता की लोकप्रियता जब बीजेपी तक पहुंची तो पार्टी ने इन्हें जिला पंचायत चुनाव में उतारने का फैसला किया. इस चुनाव में सावित्री ने जीत हासिल की और मात्र 26 साल की उम्र में जिला पंचायत अध्यक्ष बन गयीं.

राजनीतिक सफ़र भी सावित्री के लिए कम मुश्किलों भरा नहीं था. सबसे योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद इस चुनाव के बाद लगभग एक दशक तक सावित्री ठाकुर को विधानसभा या लोकसभा का टिकट नहीं मिला. कर्म में विश्वास रखने वाली सावित्री ने ‘कर्म कर, फल की चिंता मत कर’ सिद्धांत पर अपना काम जारी रखा. साल 2014 में आखिरकार भाजपा ने इनको धार सीट से लोकसभा का टिकट दिया. उस समय किसी लोकल अखबार ने अपनी हेडलाइन बनायी ‘सावित्री को मिला बरसों की तपस्या का फल’. इस सीट पर भाजपा ने सारे रिकॉर्डों को ध्वस्त करते हुए अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल की.

सावित्री ठाकुर अपने क्षेत्र में रेल कनेक्टिविटी में सुधार, युवाओं को रोज़गार के अवसर दिलवाने और मेडिकल सुविधाओं को अपग्रेड करने की दिशा में काम कर रही हैं. इन्होंने आदिवासी गाँवों की महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बहुत काम किया है. उनके लिए जॉब ओरिएंटेड ट्रेनिंग प्रोग्राम्स आयोजित करवाए हैं.