अच्छाई के रास्ते पर कठिनाईयां तो आती ही हैं – पप्पू यादव

कोई उन्हें मसीहा मानता है तो कोई रॉबिन हुड, कोई बाहुबली कहता है तो कोई विद्रोही. किसी की नज़र में वे अहंकारी हैं तो किसी की नजर में शालीन. दिखने में सख्त पर हृदय कवियों की तरह संवेदनशील. क्या किसी इंसान के व्यक्तित्व में इतना विरोधाभास संभव है? आनंदमार्ग के विचारों को जीवन-दर्शन मानने वाले सांसद राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव इसका जीता-जागता उदाहरण हैं.
उनकी चर्चा उनके बेबाक, बेलौस अंदाज के कारण भी की जाती है. यूं तो भारत सहित विश्व भर की कई स्वयंसेवी व सामाजिक संस्थायें गरीब, पीड़ित, शोषित वर्ग और रोगियों की भलाई में दिन रात कार्यरत हैं, लेकिन  नयी दिल्ली के बलवंत राय लेन स्थित अपनी सरकारी कोठी को जिस तरह उन्होने देश भर से इलाज व मदद के लिये राजधानी आने वाले परेशानहाल लोगों के लिये पनाहगार बना रखा है वो मानवता का एक अनूठा उदाहरण है. यहां लोगो को इलाज के साथ-साथ रहने और खाने की पूरी व्यवस्था वे खुद अपनी देख-रेख में करवाते हैं.
दिल्ली ही नहीं, इनके पटना स्थित आवास पर भी इलाज और अन्य मदद के लिये हर रोज आने वाले लोगों की संख्या 1000-2000, होती है. बिहार के मधेपुरा से सांसद व वर्तमान में अस्तित्व में आयी जन अधिकार पार्टी के संयोजक पप्पू यादव  समग्र विकास की बात करते हैं. एक लम्बे संघर्ष के बाद राजनीति में अपनी पहचान बनाने वाले पप्पू यादव ने टीम फेम इंडिया से अपने जीवन, राजनैतिक संघर्ष को लेकर अपना नजरिया खुलकर रखा.
उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश-
आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है ?
पारिवारिक पृष्ठभूमि बड़े किसान परिवार की थी जो अंग्रेजो के समय ही भागलपुर से मधेपुरा आ कर बस गए थे। कालांतर में दादा जी स्वतंत्र भारत में खुर्दा पंचायत के प्रथम मुखिया बने। पिता चंद्नारायण शिक्षा, समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य करने के साथ ही आनंदमार्ग के प्रमुख प्रचारक थे। वे ”चिंगारी“ नाम का समाचारपात्र भी निकलते थे माता जी श्रीमती शांतिप्रिय भी समाज सेवा के क्षेत्र में पिता जी का योगदान किया करती थी नाना जी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे और राजनैतिक सामाजिक कार्यो से जुड़े थे।
आनंदमार्गी पिता और धर्म परायण माँ के सनिध्य में बचपन कैसा बीता और शिक्षा-दीक्षा कैसी रही?
बचपन से ही पिता जी के साथ प्रातः, संध्या ध्यान-आसन तथा मंत्र का नियमित अभ्यास करता था. आनंदमार्गियो द्वारा स्थापित विद्यालय में प्रारंभिक शिक्षा होने के कारण मुझ पर आनंदमार्ग के विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा. बहुत अनुशासन था वहाँ. मेरी पढ़ाई सुपौल जिले के विद्यालय, आनंदपल्ली और आनंदपुर, भागलपुर में हुई. बाद में कजरा उच्च विद्यालय, कटिहार में. नवीं कक्षा में पूर्णिया आ गया जहां से मेरी शिक्षा के साथ मेरे संघर्ष जीवन की भी शुरुआत हुई. मेरे पिता जी के साथ मेरी भी चाहत थी कि मैं अमेरिका विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का अध्यन कर एक बड़ा समाजशास्त्री बनूं. पर कहते हैं न कि ‘होइहें वही जो राम रची राखा’ तो पूर्णिया में मेरे जीवन ने पूरा यू टर्न ले लिया.
ऐसा क्या हो गया था पूर्णिया आ कर ?
वहां मुझे पहली बार अगड़ी-पिछड़ी, उच्च और निम्न जातियों और उनके संघर्ष का अनुभव हुआ. पिता जी से आनंदमार्गी के सिद्धांत के साथ ही मुझे दादा जी के अखाड़े से कुश्ती के गुर भी सिखने का मौका मिला था, जो एक तरफ तो अन्याय का विरोध सिखाता था और दूसरी तरफ मुझे शारीरिक रूप से सक्षम भी बना दिया. कहते हैं ‘होनी प्रबल होत जग माहि’ और मेरे साथ भी वही हुआ जो होना लिखा था। एक अवांछित लड़ाई की घटना से एक अलग ही संघर्ष जीवन का शुरू हुआ।
कैसा संघर्ष? 
एक नया मोड़ जीवन का. कटिहार के एक कॉलेज में दाखिला लिया. इंटर में पिता जी की इच्छा थी मैं अपनी बुआ के पास उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला जाऊं, लेकिन उन्हीं दिनों एक चुनावी प्रत्याशी अर्जुन यादव जी से मुलाकात हुई और उनके चुनाव के दौरान मेरी राजनीतिक क्षमता को मोड़ मिला, पर इसने मेरी जिन्दगी का मकसद बदल दिया. यूँ तो अर्जुन यादव चुनाव हार गये थे लेकिन मुझे लोग उनका खास कहने लगे. इसी बीच अर्जुन यादव की हत्या हो गयी और वहीं से एक नया राजनैतिक सामाजिक संघर्ष शुरू हुआ.
यानी आप इस जातिगत लड़ाई के अगुआ बने?
नहीं, मेरी कोई व्यक्तिगत अदावत किसी भी जाति विशेष के साथ नहीं रही. हां, इतना जरुर है कि मैं समाज के सभी जाति घर्म के शोषित, व पिछड़े तबके के लिये और उन पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करता था, करता हूँ और करता रहूँगा.
राजनीति की असली शुरुआत कब हुई?
लम्बे संघर्ष और कई आरोपों के झेलते हुए मैं पहली बार 1990  में निर्दलीय विधानसभा का सदस्य चुना गया. वो दौर मंडल कमीशन का था. अगड़े-पिछड़े में समाज बंट चुका था. सामाजिक संघर्ष राजनैतिक संघर्ष चरम पर था. मैंने इस जलती हुई आग में भी अपने क्षेत्र में समाज को जोड़ने का काम किया. भयमुक्त वातावरण बनाने का प्रयास किया और एक हद तक सफल भी रहा.
इतना अच्छा काम कर रहे थे आप फिर आपकी छवि डॉन वाली या बाहुबली वाली कैसे बन गयी ?
गन्दी राजनीति और राजनेताओं ने अध्यात्मिक आनंदमार्गी विचारो के युवा की छवि बाहुबली वाली बना दी. मेरे परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गयी, मेरी माँ पर भी जानलेवा हमला हुआ. मेरे पिता जी ने इन क्षणों में भी मुझे सामाजिक मूल्य और मानवीय मोल की नीति समझायी.
उच्च आचरण की शिक्षा के बावजूद बदले की प्रतिक्रिया. क्या यही आपका स्वाभाव है या ये आपका त्वरित आक्रोश था?
बदलाव के प्रयास को आक्रोश कहना उचित नहीं है. हमारा समाज ही ऐसा है विरोध को अक्सर विद्रोह मान लिया जाता है.
आपके जेल जाने के पीछे भी क्या आपका विद्रोही स्वाभाव ही रहा है?
सदियों से बदलाव नहीं चाहने वालों ने सामाजिक कुरीतियों से लड़ने वाले का, उच्च आध्यात्मिक विचार वालों का, समाज सुधारकों का हमेशा विरोध किया है. सुकरात को जहर दिया गया, जीसस को सूली पर लटका दिया गया, हमारे मार्ग गुरु जी को भी जेल में डाल दिया गया. वहां उनकी हत्या का प्रयास किया गया.  शोषित-वांछित लोगों की लड़ाई को मजबूती से लड़ने के विरुद्ध और मेरे राजनीतिक कद के बढ़ने के विरोध में किया गया राजनैतिक षडयंत्र था. प्रचारतंत्र, प्रशासन का इसमें भरपूर उपयोग किया गया. मेरे संघर्ष गरीबों पर जुल्म के विरुद्ध होते हैं, पर बाद में उन्हें मेरे विरुद्ध प्लांट किया जाता था.
आपको इतनी आंतरिक शक्ति कहां से मिलती है ?
श्री श्री आनंदमूर्ति प्रभात रंजन सरकार मेरे मानस ईश्वर थे. मेरे मार्ग गुरु. उनके एक-एक प्रवचन के अंश मेरी सोच और समझदारी को प्रभावित करते हैं. मैंने उनसे ही त्याग, सामाजिक दायित्व, नैतिकता का पाठ पढ़ा है. आनंद मार्ग का दर्शन एकदम व्यवहारिक और वैज्ञानिक है. वहीं पिता जी से त्याग की प्रकृति, सदा जीवन उच्च विचार और देश सेवा को समर्पित होना सिखा है।
देश में कैसा बदलाव चाहते है आप ?
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जाति-धर्म की समस्या को समाप्त कर एक बेहतर हिंदुस्तान बनाना चाहता हूँ, जहां मुद्दा सिर्फ देश की उन्नति, गरीबी उन्मूलन, नशा मुक्ति और शिक्षित समाज होने का हो.
इस बदलाव के लिए क्या कोई रुपरेखा है आपके मन में ?
इस के लिए मेरे जेहन में चार अति महत्वपूर्ण विचार है –
1) शिक्षा के स्तर को मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण है कि केंद्र या राज्य सरकार से किसी भी स्तर पर जुड़े लोगो चाहे वो कलक्टर हो या सरकारी मुलाजिम, शिक्षक हो या विधायक-मंत्री के बच्चो को सरकारी स्कूल, सरकारी कॉलेज में ही शिक्षण दिलवाना अनिवार्य करवाना है. मैं इस मुद्दे को ले कर बहुत गंभीर हूँ. इस से एक ओर प्राइवेट स्कूलों की लूट पर लगाम लगेगी वही शिक्षा का स्तर भी सुधर जायेगा. इसके लिए मैं संसद में बिल भी लाने वाला हूँ.
2) स्वास्थ्य सेवा को लेकर बहुत कुछ करने की जरूरत है, ऐसा कानून लाना होगा जिसके तहत किसी भी तरह की स्वास्थ्य जाँच/ स्वास्थ्य सेवा की कीमत चाहे प्राइवेट हो या सरकारी सिर्फ सरकार ही तय करे. इससे प्राइवेट जाँच घरों, हॉस्पिटल और डॉक्टरो की मनमानी और लूट से आम जनता को छुटकारा मिल जायेगा. सबको उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवा भी मिल सके. ये इंसान के जीवन से जुड़ा है. इसमें कोई कोताही नहीं होनी चाहिये.
3) अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन व सहयोग देने के लिए बिना किसी गारन्टी के 10 लाख का रोजगार ऋण तुरंत दिया जाना चाहिये. साथ ही हर स्तर पर आरक्षण की भी व्यवस्था दी जानी चाहिये, खास कर सभी स्तरीय चुनाव में. जाति व धर्म की लड़ाई व भेदभाव को रोकने का इस से बेहतर उपाय नहीं हो सकता.
4) गरीबी हटाने के लिए कोऑपरेटिव व्यापार व्यवस्था को बढ़ाने की जरूरत है. जब तक कॉरपोरेट को मजबूती मिलती रहेगी तब तक गरीब और गरीब होगा व अमीर और अमीर होता रहेगा. देश में ज्यादा से ज्यादा खुदरा व्यापार और जरुरी उत्पादन को कॉपरेटिव के द्वारा करिये. देखिये देश की बेरोजगारी और गरीबी कैसे ख़त्म हो जाती है.
आपका पसंदीदा वाक्य ?
” अच्छे को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है “
आपके जीवन का मकसद क्या है ?
किसी भी जरूरतमंद को जब भी जरूरत हो मुझे उनके काम आना है. देश के किसी भी कोने के किसी भी जाति धर्म के लोग हो मैं हरसंभव मदद करने को तैयार हूँ. एक वाकया अभी हाल का है. उतराखंड में एक व्यक्ति बुरी तरह जल गया. उसके इलाज के लिए दिल्ली एम्स ले कर आये. वहां उन्हें समस्या हुई तो एम्स के बाहर एक ऑटो वाले ने उन्हें मेरे यहाँ भेजा. हमने उसका पूरा इलाज करवाया. ऐसे कई वाकये होते रहते हैं. मैं किसी भी जरूरतमंद की मदद के लिए हमेशा खड़ा हूँ. बस परमात्मा कृपा बनाये रखे.
फेम इंडिया के माध्यम से लोगों को खासकर युवाओं को क्या मैसेज देना चाहते है ?
ये जीवन एक बड़ा संघर्ष है आप हमेशा अच्छे काम करते रहिये. बाधा तो आनी ही है. जब आप धारा के विपरीत चलते है तो बधाएं तो आती ही रहती हैं. मन में विश्वास रखिये कि एक दिन नया सवेरा होगा ही. इसी सोच के साथ अपना प्रयास जारी रखिये.